इस नाम के कई अर्थ हैं, हर कोई अपने तरीके से व्याख्या करता है। मैं "रामचरितमानस” का संदर्भ लूँगा ।
जब राजा दशरथ ने अपने पुत्रों के नामकरण के लिए वशिष्ठ मुनि को बुलाया, तो वशिष्ठ मुनि को नामकरण के लिए कहा गया। उन्होंने कहा:
यह स्पष्ट रूप से बताता है कि भगवान राम आनंद के सागर है। उस महासागर की एक बूंद तीनों लोको को शांति प्रदान करने वाली है।उस सुख के धाम का नाम “राम है,जो संपूर्ण लोक को विश्राम देने वाला है।
यह गोस्वामी तुलसीदास द्वारा "राम" के अर्थ की बहुत सुंदर और स्पष्ट परिभाषा है।
मैं इस चौपाई से बहुत आनंदित होता हूँ ।
राम।
श्री राम तारक मंत्र
श्री राम राम रामेति, रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥
श्लेष प्रयोग का मतलब एक शब्द के द्वारा अनेक अर्थ व्यक्त किए जाते हैं, यहां राम शब्द का श्लेष प्रयोग किया गया है
यहां यह कहा गया है कि राम शब्द मन में रमने लायक है
इस महान् (वरानने) राम या मन में रमने वाले रम् शब्द के हजार के बराबर जप करने पर राम तक मन पहुंच सकता है, राममय हो जाता है।
शिवजी के डमरू के माहेश्वर सूत्रों से अक्षरों का निर्माण हुआ व्यंजन वर्ण का अंतिम् अक्षर है र इसमें शुद्ध व्यंजन क च ट त प के पांच वर्गो मे अंतिम प वर्ग के अंतिम अक्षर म को मिलाकर रम् बनता है
रं रं या रम् रम् लगातार कहने या सोचने से व्यक्ति ध्यान और समाधि की अवस्था में पंहुच जाता है
अक्षर याने अविनाशी
अतः यह माना जाता है कि अक्षरों पर मनन करने से व्यक्ति या उसका मन अक्षरमय या अविनाशी ईश्वर तक पहुंच जाता है
शिव, गणेश, कार्तिकेय इत्यादि स्वयं बाहर से आये हुए देवता हैं
अरबी शब्द राम का अर्थ है क़स्द करना, संकल्प करना।
जो ध्यान के आस पास ही आता है
1.) संस्कृत रम्' धातु में 'घञ्' प्रत्यय के योग से 'राम' शब्द बनता है। राम का एक ग्रन्थ के अनुसार अर्थ इस सृष्टि का स्वामी भी होता हैं। "रमंति इति रामः" अर्थात जो रोम-रोम में रहता है, जो समूचे ब्रह्मांड में रमण करता है वह राम है। "योगिनाम ह्रदये रमन्ति इति राम:" अर्थात जो योगियों के ह्रदय में रमन्ते हैं और जो योगियों के आराध्य ॐ शव्द से हैं वो श्री राम हैं।
रम् धातु घञ् प्रत्यय से राम शब्द का निष्पन्न हुआ है । रम् धातु का अर्थ है रमण । जो प्रत्येक के ह्रदय में रमण (निवास ) करते हैं वे राम है । भक्त जिनके रमण ( ध्यान में लीन ) करते हैं वे राम है । राम का अर्थ अपार्थिव सुन्दरता भी होता है अर्थात जिनके सुन्दरता वर्णन करने में देवता भी सक्षम नहीं है ।
[2] 'रम्' धातु का अर्थ रमण (निवास, विहार) करने से सम्बद्ध है। वे श्री राम प्राणीमात्र के हृदय में 'रमण' (निवास) करते हैं, इसलिए यह 'राम' हैं तथा भक्तजन उनमें/ उन प्रभु में 'रमण' करते हैं (ध्याननिष्ठ होते) हैं, इसलिए भी वे 'राम' हैं और वो राम हमारे सभी के लिए आदर्श प्रमुख विग्रह हैं इसलिए श्री राम हैं।
'विष्णुसहस्रनाम' पर लिखित अपने भाष्य में आदि शंकराचार्य ने पद्मपुराण का हवाला देते हुए कहते हैं कि जो नित्यानन्दस्वरूप हैं और जिन भगवान् में योगिजन रमण करते हैं, इसलिए वे 'राम' हैं।
वैदिक साहित्य में 'राम' का उल्लेख प्रचलित रूप में नहीं मिलता है और कई जगह वेदो में राम को इन्दर कहकर सम्बोधित किया गया है। कहीं-कहीं तो श्री राम को वेद पुरुष और अनादि और आदि पुरुष और भी कहा गया है। इस कारण जो आनन्द के धाम हैं वो भगवान् श्री राम हैं। इसी कारण भगवान् को आनन्दकंद भी कहा जाता है। श्री राम, श्री विष्णु और श्री कृष्ण को आनंदकंद कहा जाता हैं।
ऋग्वेद में केवल दो स्थलों पर ही 'राम' शब्द का प्रयोग हुआ है और कई जगह वेदो में राम को इन्दर कहकर सम्बोधित किया गया है. [4] (१०-३-३ तथा १०-९३-१४)। उनमें से भी एक जगह काले रंग (रात के अंधकार) के अर्थ में कहा गया है। श्री राम को काकुस्थ, इच्छवाकु और कौशलेश, अयोध्या नगरी के राजा इत्यादि नामो से बिभूषित हैं। चारो वेदो में श्री राम का वर्णन हैं।
तथा शेष एक जगह ही व्यक्ति के अर्थ में प्रयोग हुआ है। यद्यपि नीलकंठ चतुर्धर ने ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों को स्वविवेक से चुनकर उनके रामकथापरक अर्थ किये हैं। ऋग्वेद में एक स्थल पर 'इक्ष्वाकुः' (१०-६०-४) का[7] तथा एक स्थल पर[8] 'दशरथ' (१-१२६-४) शब्द का भी प्रयोग हुआ है।
ब्राह्मण साहित्य में 'राम' शब्द का प्रयोग ऐतरेय ब्राह्मण में दो स्थलों पर [10] (७-५-१{=७-२७} तथा ७-५-८{=७-३४})हुआ है; परन्तु वहाँ उन्हें 'रामो मार्गवेयः' कहा गया है, जिसका अर्थ आचार्य है।[11] शतपथ ब्राह्मण में एक स्थल पर[10] 'राम' शब्द का प्रयोग हुआ है (४-६-१-७)। यहाँ 'राम' यज्ञ के आचार्य के रूप में है तथा उन्हें 'राम औपतपस्विनि' कहा गया है।
प्रचलित राम का अवतारी रूप वाल्मीकीय रामायण एवं और सारे वेद पुराणों में अवतार और पूर्णतम पतरपर, परमब्रह्म पुरुषोत्तम हैं और फिर सारे ग्रन्थ और पुराणों में स्वयं भगवान् और यग पुरुष के अर्थ में बिभूषित हैं. हाला की श्री राम इस धरती पर अवतार लेने से पहले भी प्रसिद्ध थे, इसलिए श्री राम कोई चार नहीं, बलिक एक हैं। यह स्पष्ट स्वयं भगवान् शिव ने श्री राम चरित्र मानस में किया है।
ऐसा कोई ग्रन्थ नहीं जिसमे श्री राम कथा न हो और इसीसे आप अन्दाज़ा लगा सकते हैं की श्री राम कितना महत्वपूर्ण हैं। हर हिन्दू के पहचान यदि कोई हैं तो श्री राम हैं।
वैसे अनेक प्रमुख चरित्र हैं सनातन धर्म में- जैसे की श्री शिव जी, श्री कृष्ण, श्री नारायण, श्री विष्णु और अनेक उनके रूप, पर जो ह्रदय को छूते हैं और हर व्यक्ति अपने पास यदि हर स्थति में देखता हैं तो वो हैं श्री राम?
हिन्दू धर्म का जन्म ही नहीं गर्भ धारण से
लेकर पुरे जीवन और १६ संस्कार से लेकर जीवनपर्यन्त और फिर अंत काल बिना श्री राम के गति और सद्गति परलोक में भी नहीं? चाहे कोई श्री राम को न भी माने और दूसरे कोई देवी देवता के उपासक हो, पर वो चाहे प्रत्यछ या अप्रत्यछ भगवान् श्री राम से सीधे जुड़ा हैं क्योंकि, ॐ = श्री राम और श्री राम= ॐ हैं. सनातन वैदिक धर्म यदि कोई साच्छात विग्रह हैं तो वो हैं श्री राम और अन्य कोई नहीं? सारे देवी देवताओ और इस अनंत ब्रह्माण्ड के स्वामी श्री राम है और उन्ही के रूप छीरसागर में विष्णु रूप से स्थित हैं। कई जगह श्री राम को महाविष्णु भी कहा गया हैं।
रामकथा से सम्बद्ध सर्वाधिक प्रमाणभूत ग्रन्थ आदिकाव्य वाल्मीकीय रामायण में राम-जन्म के सम्बन्ध में निम्नलिखित वर्णन उपलब्ध है:-
चैत्रे नावमिके तिथौ।।
नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु।
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।।
अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि में, पुनर्वसु नक्षत्र में, पाँच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर (श्रीराम का प्राकट्य हुआ)।
यहाँ केवल बृहस्पति तथा चन्द्रमा की स्थिति स्पष्ट होती है। बृहस्पति उच्चस्थ है तथा चन्द्रमा स्वगृही। आगे पन्द्रहवें श्लोक में सूर्य के उच्च होने का उल्लेख है। इस प्रकार बृहस्पति तथा सूर्य के उच्च होने का पता चल जाता है। बुध हमेशा सूर्य के पास ही रहता है। अतः सूर्य के उच्च (मेष में) होने पर बुद्ध का उच्च (कन्या में) होना असंभव है। इस प्रकार उच्च होने के लिए बचते हैं शेष तीन ग्रह- मंगल, शुक्र तथा शनि। इसी कारण से प्रायः सभी विद्वानों ने राम-जन्म के समय में सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि को उच्च में स्थित माना है। यानी जो सबसे श्रेष्ठ हैं और अच्युत हैं उनके लिए सारे गृह भी ऊंच स्थति में श्री राम के प्राकट्य के समय थे।
श्री रामनवमी का त्यौहार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी मनाया जाता है। हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान श्री राम जी का जन्म/प्राकट्य हुआ था।
चैत्रे नवम्यां प्राक् पक्षे दिवा पुण्ये पुनर्वसौ ।
उदये गुरुगौरांश्चोः स्वोच्चस्थे ग्रहपञ्चके ॥
मेषं पूषणि सम्प्राप्ते लग्ने कर्कटकाह्वये ।
आविरसीत्सकलया कौसल्यायां परः पुमान् ॥ (निर्णयसिन्धु)
लीला से उन्हें जन्म लेने के कारण श्री राम नवमी जन्मोत्सव प्रतिवर्ष मनाया जाता ह, पर वो श्री राम तो अजन्मा अविनाशी हैं। भगवान् जन्म नहीं लेते, बल्कि वो तो प्रगट होते हैं। उनका प्राकट्य हुआ था।
भये प्रगट कृपाला, दीन दयाला, कौशल्या हितकारी । (श्रीराम चरित मानस)
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी ,
लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा, निज आयुध भुज चारि।
अर्थात वो जन्म नहीं लिए थे, बलिक प्रभु चतुर्भुज रूप में बड़े गुप्त रूप से माता कौशलया के सामने प्रगट हुए थे और फिर माता के अनुरोध पर वो रूप छिपकर एक अवोध शिशु के रूप में स्वयं को बदलकर रोने लगे, मानो अभी जन्म हुआ है? आगे और भी व्याख्या हैं, पर आप इसी से समझ लें की वो कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बलिक स्वयं भगवान हैं।
भगवान राम चन्द्र जी का जीवनकाल एवं पराक्रम महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य रामायण के रूप में वर्णित हुआ है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी उनके जीवन पर केन्द्रित भक्तिभावपूर्ण सुप्रसिद्ध महाकाव्य श्री रामचरितमानस जी की रचना की है। इन दोनों के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं में भी रामायण की रचनाएं हुई हैं, जो काफी प्रसिद्ध भी हैं। खास तौर पर उत्तर भारत में श्री राम जी अत्यंत पूज्यनीय हैं और आदर्श पुरुष हैं। इन्हें पुरुषोत्तम शब्द से भी अलंकृत किया जाता है।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी, अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के सबसे बड़े पुत्र थे। राम की पत्नी का नाम सीता था इनके तीन भाई थे- लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। हनुमान जी महराज , श्री रामजी के, सबसे बड़े भक्त माने जाते हैं। श्री राम जी ने लंका के राजा रावण (जो अधर्म का पथ अपना लिया था) का वध किया। श्री राम जी की प्रतिष्ठा मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में और स्वयं भगवान् के रूप में है। श्री राम ने मर्यादा के पालन के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता, यहाँ तक कि पत्नी का भी साथ छोड़ा। इनका परिवार आदर्श भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता है।श्री राम रघुकुल में जन्मे थे, जिसकी परम्परा प्रान जाई,पर बचनु न जाई।
अतएव यदि हम त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग का आगमन देखे तो परंपरागत रूप से श्री राम का प्राकट्य आज से कम से कम लगभग 9 लाख वर्ष से पहले माना जाता है।
।।जय श्री राम।।
राम-राम" शब्द कोई सामान्य शब्द नहीं है। सनातन संसार के समस्त साहित्य को धार्मिकता की दृष्टि से देखें तो 80 प्रतिशत राम और कृष्ण के बारें में ही है।'राम' शब्द के संदर्भ में स्वयं गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा:
करऊँ कहा लगि नाम बड़ाई।
राम न सकहि नाम गुण गाई ।।
स्वयं राम भी 'राम' शब्द की व्याख्या नहीं कर सकते,ऐसा राम नाम है।
'राम-राम' शब्द जब भी प्रणाम के सेन्स में होता है तो दो बार कहा जाता है।ऐसा कहने के पीछे भी एक वैदिक दृष्टिकोण है।पूर्ण ब्रह्म का मात्रिक गुणांक 108 है।वह राम-राम शब्द दो बार कहने से पूरा हो जाता है,क्योंकि हिंदी वर्णमाला में ''र" 27 वा अक्षर है।'आ' की मात्रा दूसरा अक्षर और 'म' 25 वा अक्षर,इसलिए सब मिलाकर जो गुणांक बनता है वह है 54 और दो बार राम राम कहने से 108 हो जाता है जो पूर्ण ब्रह्म का द्योतक है।
'राम' विश्व संस्कृति के अप्रतिम नायक है।वे सभी सद्गुणों से युक्त है।वे मानवीय मर्यादाओं के पालक और संवाहक है।इसलिए संपूर्ण मानव है।अगर सामाजिक जीवन में देखें तो- राम आदर्श पुत्र है,आदर्श भाई है,आदर्श मित्र है, आदर्श पति है,आदर्श शिष्य है--- राम आदर्श है अर्थात् समस्त आदर्शों के एक मात्र न्यायादर्श 'राम' है।इसलिए वह केवल एक राम है जिन्हें भूतपूर्व राजा राम नहीं,बल्कि राजा रामचंद्र की जय कहा जाता है। साहित्य का अध्ययन करें तो हम पाते है- 'रावणस्य मरणं राम'अर्थात् राम वह है जो रावण (बुराइयों) को मारता है।
पाश्चात्य विद्वानों ने लिखा है-
'Ram means the light within me, the light in my heart."
इसीलिए तुलसीदास ने उस डिवाइन लाइट(Divine light) की बात की है जिसमें 'राम' का अर्थ 'आभा' अथवा 'कांति' से है और 'म' का अर्थ मैं अथवा मेरा से है।कहने का आशय यह है कि- राम वह है जो मेरे अंदर जीवंतता प्रदान करता है।
'राम' के संबंध में बहुत सारी कथाएं समाज में व्याप्त है।राम विराम है,राम विश्राम है,राम अभिराम है,राम आनंद है------ आदि आदि।विभिन्न उपासकों ने 'राम' के चरित्र का चित्रण अलग- अलग रूपों में किया है।आदि कवि वाल्मीकि के 'राम' वेदनायुक्त है तो भवभूति के 'राम' इतना दुखी है कि वह पत्थर को भी रुला सकते है। तुलसी के 'राम' मर्यादा पुरुषोत्तम है।मर्यादा कभी नहीं छोड़ते।तुलसी के राम तो जनता के सुख-दु:ख से प्रतिध्वनित राम है।गांधी के 'राम' विश्व संस्कृति के प्रतीक राम है।इसलिए 'राम' के बारें में कुछ कहना या सोचना सामान्य नहीं है।
'राम' निराश्रित जनों की 'संधि'है, हारे हुए लोगों के लिए वह 'समास' है।इसीलिए कहा गया है-
'हारे को हरिनाम'
राम वो जादुई शब्द है, जिस को अलग अलग उपसर्ग से जोड़े तो अर्थ बदलता रहता है ।
बिस्तर पर सोये पड़े रहने वाले को
*आराम* कहते हैं
जो सोता है और फिर कभी नहीं उठता उसे
*हे राम* कहते हैं
वह जो एक मित्र की तरह दिखता है, इसे *सखा राम* कहा जाता है ।
राजा को आदर्श बनाकर जीने वाले को
*राजा राम* कहते हैं।
जो हृदय को जानता है उसे
*आत्मा राम* कहते हैं।
एक पत्नीव्रत के अनुसार आचरण करने वाला *सीता राम* कहलाता है।
भगवान जिनके चरणों की पूजा करते है उन्हें *तुका राम* कहा जाता है।
अवसर पर अन्याय और अधर्म से शस्त्रों या शास्त्रों के साथ लड़ने वालों को
*परशु राम* कहा जाता है।
जो भगवान का सेवक रहता है उसे
*राम दास* कहा जाता है।
आज के युग में भी भोर में ही उठाने वाले को *आला राम* कहते हैं।
सेवा व्रत करने वाले को
*सेवा राम* कहते हैं।
फल का प्रसाद बनाने वाले को
*मेवा राम* कहते हैं।
और
ये सब समझने वाले को
*। राम राम । * कहते हैं।
देखा? आप वाचक ने सोलह बार राम का नाम लिया।
आपने राम नाम को गिना?
चलिए, आप को *राम राम* ,
अब तो 14 से 16 हुआ ना?
राम शब्द रं बीज मंत्र का अपभ्रंश है। रं हमारी नाभि चक्र का अग्नि बीज मंत्र है। यदि राम के स्थान पर रं-रं बीजमन्त्र नाभि का ध्यान करते हुए जपें, तो अपार ऊर्जा आती है। जीवन में उमंग उत्पन्न होने लगती है। सिद्धियों का अंबार एकत्रित होने लगता है। यह रं मन्त्र कुण्डलिनी चक्र को जाग्रत कर देता है।
योग-ध्यान शास्त्रों में मूलाधार चक्र का बीज मंत्र लं है। स्वाधिष्ठान चक्र का बीज मंत्र वं है और रं बीजमन्त्र का जप नाभि को जाग्रत करने के लिए करने की परंपरा है। इसके आगे के 4 चक्र और हैं, जो गुरु के सानिध्य में पूरे होते हैं। इन सबके साधने से एक सामान्य व्यक्ति भी अष्ट सिद्धि का ज्ञाता हो जाता है।
परशुराम शतक एवं भविष्यपुराण के अनुसार हनुमान जी ने रं बीज मंत्र के जाप से 5 सिद्धियां प्राप्त की थी।
वैसे राम जपने से आराम तो मिलेगा, लेकिन जीवन हराम हो जाएगा। यह बहुत ही रहस्यमयी बात है। इससे कोई सिद्धि नहीं मिलेगी।
भारत में बहुत से अंधभक्त खुद भटककर दूसरों को भी पथभ्रष्ट कर रहें हैं।
इस बारे में कभी शास्त्रमत तरीके से बहुत विस्तार से बताया जाएगा। फिलहाल अंधभक्तों को बुरा लगेगा। आप खुद भी खोज और अनुभव करें कि राम नाम से कितना लाभ हुआ है।
आप चाहें, तो नमःशिवाय च शिवाय नमः
मन्त्र को इतना जपें कि यह अजपा हो जाये। फिर कल्याण ही कल्याण है।
तुलसीदास जी ने भी अंत में लिखा है-
भावन्ही मेट सकें त्रिपुरारी।
आदि शंकराचार्य का कथन है-
शिव ही विधाता शिव ही विधान।
शिव ही ज्ञानी, शिव ही ज्ञान।।
अघोरी सन्त कीनाराम जी कहते थे-
मैं अति दुर्बल, मैं मतिहीना।
जो कछु कीन्हा शम्भू कीन्हा।।
जिंदगी की गंदगी दूर करने के लिए परमहंस सन्तों की आत्म कथाओं का अध्ययन करें।
सुनी सुनाई बातों पर ध्यान देंगे, तो आप सोना होकर भी सुन्न हो जाएंगे।
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