002. भगवान राम के विषय में उमा और शिवजीका संवाद
002. भगवान राम के विषय में उमा और शिवजीका संवाद दो०- कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद। भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद ॥ ४७ ॥ एक बार त्रेता जुग माहीं । संभु गए कुंभज रिषि पाहीं ॥ संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी ॥ १॥ रामकथा मुनिबर्ज बखानी। सुनी रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही महेस परम सुखु मानी ॥ संभु अधिकारी पाई ॥ २॥ कहत सुनत रघुपति गुन गाथा । कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा ॥ मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी । चले भवन सँग दच्छकुमारी ॥ ३॥ तेहि अवसर भंजन महिभारा । हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा ॥ पिता बचन तजि राजु उदासी । दंडक बन बिचरत अबिनासी ॥४॥ अब मैं अपनी बुद्धिके अनुसार वही उमा और शिवजीका संवाद कहता हूँ। वह जिस समय और जिस हेतुसे हुआ, उसे हे मुनि ! तुम सुनो, तुम्हारा विषाद मिट जायगा ॥ ४७ ॥ एक बार त्रेतायुगमें शिवजी अगस्त्य ऋषिके पास गये। उनके साथ जगज्जननी भवानी सतीजी भी थीं। ऋषिने सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर जानकर उनका पूजन किया ॥ १॥ मुनिवर अगस्त्यजीने रामकथा विस्तारसे कही, जिसको महेश्वरने परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषिने शिवजीसे सुन्दर हरिभक्ति पूछी और शिवजीने उनको अधिकार...