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Showing posts from February, 2026

विज्ञान –> 02. संसारमें चार जाति (अण्डज-जरायुज-स्वेदज और उद्भिज्ज) के जीव हैं; काशीमें मरने से सभी परमपदको प्राप्त करते हैं ॥

संतत जपत संभु अबिनासी । सिव भगवान ग्यान गुन रासी ॥ आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥ २ ॥ हे प्रभो ! संतलोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरुके साथ छिपाव करनेसे हृदयमें निर्मल ज्ञान नहीं होता ॥ ४५ ॥ यही सोचकर मैं अपना अज्ञान प्रकट करता हूँ। हे नाथ ! सेवकपर कृपा करके इस अज्ञानका नाश कीजिये। संतों, पुराणों और उपनिषदोंने रामनामके असीम प्रभावका गान किया है ॥ १॥ कल्याणस्वरूप, ज्ञान और गुणोंकी राशि, अविनाशी भगवान् शम्भु निरन्तर रामनामका जप करते रहते हैं। संसारमें चार जाति (अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्ज) के जीव हैं, काशीमें मरनेसे सभी परमपदको प्राप्त करते हैं ॥ २ ॥ { यहाँ  “चार जातियाँ”  सामाजिक वर्ण (ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि) नहीं हैं, बल्कि  जीवों की उत्पत्ति के चार प्रकार  हैं, जिन्हें शास्त्रों में  चतुर्विध योनियाँ  कहा गया है। संसार की चार जातियाँ (चतुर्विध योनियाँ) शास्त्रों (गरुड़ पुराण, भागवत, मनुस्मृति) के अनुसार संसार में सभी जीव चार प्रकार से उत्पन्न होते हैं—अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्ज 1️⃣  अण...

विज्ञान –> 01. सती और भगवान राम का मिलन त्रेतायुग में कैसे हुआ?

🌺 1️⃣ सती — श्रद्धा की प्रथम अवस्था सती, दक्ष प्रजापति की कन्या थीं और शिव की अर्धांगिनी। जब भगवान वन में सीता-वियोग में विलाप कर रहे थे, तब शिव ने उन्हें साक्षात् ब्रह्म कहा। सती को संदेह हुआ — “जो रो रहा है, वह परमब्रह्म कैसे?” 👉  सती ने राम की परीक्षा ली — सीता का रूप धारण करके। राम ने तुरंत पहचान लिया और “माता” कहकर प्रणाम किया। सती का अहंकार चूर हुआ — परंतु शिव सर्वज्ञ थे। उन्होंने जान लिया कि सती ने परीक्षा ली। दक्ष यज्ञ और आत्मदाह — अहंकार का अंतिम विसर्जन ने यज्ञ किया, पर शिव का अपमान किया। सती ने अपमान सहा नहीं। उन्होंने योगाग्नि में देह त्याग दी। यह आत्महत्या नहीं थी — यह  अहंकार, अपमान और देह-भाव का त्याग  था। सती पुनर्जन्म लेती हैं — पार्वती के रूप में, हिमवान की पुत्री। पार्वती ने कठोर तप किया — हजारों वर्षों तक। तब जाकर शिव ने उन्हें स्वीकार किया। तुलसीदास जी रामचरितमानस में वर्णन करते हैं –>  एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी॥ बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी ॥ 1 ॥ दक्षसुता सतीजी इस प्रकार बहुत दुःखित थीं, उनको इतन...

003. भगवान राम के विषय में उमा और शिवजीका संवाद

003. भगवान राम के विषय में उमा और शिवजीका संवाद जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई ॥ तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सबु जाना ॥ २ ॥ बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूठ कहावा ॥ हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना ॥  ३ ॥ सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा ॥ जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती ॥ ४ ॥ आपने जो कहा वह झूठ नहीं हो सकता, मेरे मनमें यह बड़ा (पूरा) विश्वास है। तब शिवजीने ध्यान करके देखा और सतीजीने जो चरित्र किया था, सब जान लिया ॥ २॥  फिर श्रीरामचन्द्रजीकी मायाको सिर नवाया, जिसने प्रेरणा करके सतीके मुँहसे भी झूठ कहला दिया। सुजान शिवजीने मनमें विचार किया कि हरिकी इच्छारूपी भावी प्रबल है॥ ३॥ सतीजीने सीताजीका वेष धारण किया, यह जानकर शिवजीके हृदयमें बड़ा विषाद हुआ। उन्होंने सोचा कि यदि मैं अब सतीसे प्रीति करता हूँ तो भक्तिमार्ग लुप्त हो जाता है और बड़ा अन्याय होता है ॥ ४ ॥ सती परम पवित्र हैं, इसलिये इन्हें छोड़ते भी नहीं बनता और प्रेम करनेमें बड़ा पाप है। प्रकट करके महादेवजी कुछ भी नहीं कहते...

विज्ञान –> 03. “ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥”

कहाँ से आई? पंक्ति “ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी।  सकल ताड़ना के अधिकारी॥” यह पंक्ति तुलसीदास कृत रामचरितमानस के उत्तरकांड में मिलती है। यह सीधे तुलसीदास का उपदेश नहीं, बल्कि कथा-प्रसंग में कहा गया वाक्य है—यही बात अक्सर अनदेखी कर दी जाती है। 2️⃣ शाब्दिक अर्थ (Literal Meaning) ढोल → वाद्य, जिसे बजाने पर ही स्वर निकलता है गँवार → अशिक्षित / अनुशासनहीन व्यक्ति शूद्र → तत्कालीन वर्णव्यवस्था का एक वर्ग पशु → जो विवेक से नहीं, प्रवृत्ति से चलता है नारी → स्त्री ताड़ना का आज का अर्थ “मार-पीट” समझ लिया जाता है, लेकिन ताड़ना शब्द  संस्कृत धातु  →  तड् / ताड़् से उत्पन्न हुआ है। इसके अर्थ हैं: जांचना  परखना  देखना निहारना पहचानना संकेत देना ध्यान देना समझाना चेताना 👉 यानी  ताड़ना = मारना नहीं बल्कि   सूक्ष्म निरीक्षण और समझ। लोक-भाषा का एक प्रमुख प्रमाण: “आँखों ही आँखों से ताड़ लेना” यह मुहावरा सबसे बड़ा सबूत है 👇 “मैं तो लोगों को आँखों ही आँखों से ताड़ लेता हूँ।” “आँखों ही आँखों से ताड़ लेना” एक मुहावरा है, जिसका अर्थ है — बिना बोले ही किसी के विषय...