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H 003. भगवान राम के विषय में उमा और शिवजीका संवाद

H 003. भगवान राम के विषय में उमा और शिवजीका संवाद जब पास पहुँचीं, तब श्रीशिवजीने हँसकर कुशल-प्रश्न करके कहा कि तुमने रामजीकी किस प्रकार परीक्षा ली, सारी बात सच-सच कहो ॥  सतीजीने श्रीरघुनाथजीके प्रभावको समझकर डरके मारे शिवजीसे छिपाव किया और कहा-हे स्वामिन् ! मैंने कुछ भी परीक्षा नहीं ली, [वहाँ जाकर ] आपकी ही तरह प्रणाम किया।। अब आगे जानिए  आपने जो कहा वह झूठ नहीं हो सकता, मेरे मनमें यह बड़ा (पूरा) विश्वास है। तब शिवजीने ध्यान करके देखा और सतीजीने जो चरित्र किया था, सब जान लिया ॥ २॥  फिर श्रीरामचन्द्रजीकी मायाको सिर नवाया, जिसने प्रेरणा करके सतीके मुँहसे भी झूठ कहला दिया। सुजान शिवजीने मनमें विचार किया कि हरिकी इच्छारूपी भावी प्रबल है॥ ३॥ सतीजीने सीताजीका वेष धारण किया, यह जानकर शिवजीके हृदयमें बड़ा विषाद हुआ। उन्होंने सोचा कि यदि मैं अब सतीसे प्रीति करता हूँ तो भक्तिमार्ग लुप्त हो जाता है और बड़ा अन्याय होता है ॥ ४ ॥ सती परम पवित्र हैं, इसलिये इन्हें छोड़ते भी नहीं बनता और प्रेम करनेमें बड़ा पाप है। प्रकट करके महादेवजी कुछ भी नहीं कहते, परन्तु उनके हृदयमें बड़ा सन्ताप है ॥...

H 002. भगवान राम के विषय में उमा और शिवजीका संवाद

002. भगवान राम के विषय में उमा और शिवजीका संवाद अभी तक आपने जाना कि  इसपर याज्ञवल्क्यजी मुसकराकर बोले, श्रीरघुनाथजीकी प्रभुताको तुम जानते हो ॥ श्रीरामजीके तुम मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके भक्त हो। तुम्हारी चतुराईको मैं जान गया। तुम रहस्यमय गुणोंको सुनना चाहते हो; इसीसे तुमने ऐसा प्रश्न किया है मानो बड़े ही मूढ़ हो ॥  हे तात! तुम आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो; मैं श्रीरामजीकी सुन्दर कथा कहता हूँ। बड़ा भारी अज्ञान विशाल महिषासुर के समान है और श्रीरामजीकी कथा [उसे नष्ट कर देनेवाली] भयंकर कालीजी हैं ॥  श्रीरामजीकी कथा चन्द्रमाकी किरणोंके समान है, जिसे संतरूपी चकोर सदा पान करते हैं। तुम्हारे जैसा ही सन्देह पार्वतीजीने किया था, तब महादेवजीने विस्तारसे उसका उत्तर दिया था ॥  अब आगे जानिए अब मैं अपनी बुद्धिके अनुसार वही उमा और शिवजीका संवाद कहता हूँ। वह जिस समय और जिस हेतुसे हुआ, उसे हे मुनि ! तुम सुनो, तुम्हारा विषाद मिट जायगा ॥ एक बार त्रेतायुगमें शिवजी अगस्त्य ऋषिके पास गये। उनके साथ जगज्जननी भवानी सतीजी भी थीं। ऋषिने सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर जानकर उनका पूजन किया ॥ मुनिवर अगस्त्यज...

H 001. भरद्वाजजी द्वारा याज्ञवल्क्य मुनि को अपने आश्रम में रोककर उनसे श्रीराम कथा कहने का आग्रह

001. भरद्वाजजी द्वारा याज्ञवल्क्य मुनि को अपने आश्रम में रोककर उनसे श्रीराम कथा कहने का आग्रह   तुलसी दास जी कहते हैं कि  मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि मन अन्हवाइ ।  सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ ।। ४३ (क) ॥ अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद । कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद ॥ ४३ (ख) ॥ तुलसी दास जी कहते हैं कि हे प्रभु ! अपनी बुद्धिके अनुसार इस सुन्दर राम कथा रूपी जल के गुणोंको विचारकर, उसमें अपने मनको स्नान कराकर और श्रीभवानी–शङ्करको स्मरण करके यह कवि (तुलसीदास) सुन्दर कथा कहता है॥ मैं अब श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंको हृदयमें धारणकर और उनका आशीर्वाद रूपी प्रसाद पाकर दोनों श्रेष्ठ मुनियोंके मिलनका सुन्दर संवाद वर्णन करता हूँ ।। भरद्वाज मुनि, तीर्थराज प्रयागमें (अपने आश्रम में) बसते हैं,  उनका श्रीरामजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम है। वे तपस्वी, निगृहीतचित्त, जितेन्द्रिय, दयाके निधान और परमार्थके मार्गमें बड़े ही चतुर हैं ॥ माघ मास में जब सूर्यदेव मकर राशिपर जाते हैं तब देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्योंके समूह सब आदरपूर्वक तीर्थराज प्रयाग में स्थित त्र...
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इस नाम के कई अर्थ हैं, हर कोई अपने तरीके से व्याख्या करता है। मैं "रामचरितमानस” का संदर्भ लूँगा । जब राजा दशरथ ने अपने पुत्रों के नामकरण के लिए वशिष्ठ मुनि को बुलाया, तो वशिष्ठ मुनि को नामकरण के लिए कहा गया। उन्होंने कहा: यह स्पष्ट रूप से बताता है कि भगवान राम आनंद के सागर है। उस महासागर की एक बूंद तीनों लोको को शांति प्रदान करने वाली है।उस सुख के धाम का नाम “राम है,जो संपूर्ण लोक को विश्राम देने वाला है। यह गोस्वामी तुलसीदास द्वारा "राम" के अर्थ की बहुत सुंदर और स्पष्ट परिभाषा है। मैं इस चौपाई से बहुत आनंदित होता हूँ । राम। श्री राम तारक मंत्र श्री राम राम रामेति, रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥ श्लेष प्रयोग का मतलब एक शब्द के द्वारा अनेक अर्थ व्यक्त किए जाते हैं, यहां राम शब्द का श्लेष प्रयोग किया गया है यहां यह कहा गया है कि राम शब्द मन में रमने लायक है इस महान् (वरानने) राम या मन में रमने वाले रम् शब्द के हजार के बराबर जप करने पर राम तक मन पहुंच सकता है, राममय हो जाता है। शिवजी के डमरू के माहेश्वर सूत्रों से अक्षरों का निर्माण हुआ व्...

विज्ञान –> 02. संसारमें चार जाति (अण्डज-जरायुज-स्वेदज और उद्भिज्ज) के जीव हैं; काशीमें मरने से सभी परमपदको प्राप्त करते हैं ॥

संतत जपत संभु अबिनासी । सिव भगवान ग्यान गुन रासी ॥ आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥ २ ॥ हे प्रभो ! संतलोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरुके साथ छिपाव करनेसे हृदयमें निर्मल ज्ञान नहीं होता ॥ ४५ ॥ यही सोचकर मैं अपना अज्ञान प्रकट करता हूँ। हे नाथ ! सेवकपर कृपा करके इस अज्ञानका नाश कीजिये। संतों, पुराणों और उपनिषदोंने रामनामके असीम प्रभावका गान किया है ॥ १॥ कल्याणस्वरूप, ज्ञान और गुणोंकी राशि, अविनाशी भगवान् शम्भु निरन्तर रामनामका जप करते रहते हैं। संसारमें चार जाति (अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्ज) के जीव हैं, काशीमें मरनेसे सभी परमपदको प्राप्त करते हैं ॥ २ ॥ { यहाँ  “चार जातियाँ”  सामाजिक वर्ण (ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि) नहीं हैं, बल्कि  जीवों की उत्पत्ति के चार प्रकार  हैं, जिन्हें शास्त्रों में  चतुर्विध योनियाँ  कहा गया है। संसार की चार जातियाँ (चतुर्विध योनियाँ) शास्त्रों (गरुड़ पुराण, भागवत, मनुस्मृति) के अनुसार संसार में सभी जीव चार प्रकार से उत्पन्न होते हैं—अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्ज 1️⃣  अण...

विज्ञान –> 01. सती और भगवान राम का मिलन त्रेतायुग में कैसे हुआ?

🌺 1️⃣ सती — श्रद्धा की प्रथम अवस्था सती, दक्ष प्रजापति की कन्या थीं और शिव की अर्धांगिनी। जब भगवान वन में सीता-वियोग में विलाप कर रहे थे, तब शिव ने उन्हें साक्षात् ब्रह्म कहा। सती को संदेह हुआ — “जो रो रहा है, वह परमब्रह्म कैसे?” 👉  सती ने राम की परीक्षा ली — सीता का रूप धारण करके। राम ने तुरंत पहचान लिया और “माता” कहकर प्रणाम किया। सती का अहंकार चूर हुआ — परंतु शिव सर्वज्ञ थे। उन्होंने जान लिया कि सती ने परीक्षा ली। दक्ष यज्ञ और आत्मदाह — अहंकार का अंतिम विसर्जन ने यज्ञ किया, पर शिव का अपमान किया। सती ने अपमान सहा नहीं। उन्होंने योगाग्नि में देह त्याग दी। यह आत्महत्या नहीं थी — यह  अहंकार, अपमान और देह-भाव का त्याग  था। सती पुनर्जन्म लेती हैं — पार्वती के रूप में, हिमवान की पुत्री। पार्वती ने कठोर तप किया — हजारों वर्षों तक। तब जाकर शिव ने उन्हें स्वीकार किया। तुलसीदास जी रामचरितमानस में वर्णन करते हैं –>  एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी॥ बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी ॥ 1 ॥ दक्षसुता सतीजी इस प्रकार बहुत दुःखित थीं, उनको इतन...

003. भगवान राम के विषय में उमा और शिवजीका संवाद

003. भगवान राम के विषय में उमा और शिवजीका संवाद जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई ॥ तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सबु जाना ॥ २ ॥ बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूठ कहावा ॥ हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना ॥  ३ ॥ सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा ॥ जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती ॥ ४ ॥ आपने जो कहा वह झूठ नहीं हो सकता, मेरे मनमें यह बड़ा (पूरा) विश्वास है। तब शिवजीने ध्यान करके देखा और सतीजीने जो चरित्र किया था, सब जान लिया ॥ २॥  फिर श्रीरामचन्द्रजीकी मायाको सिर नवाया, जिसने प्रेरणा करके सतीके मुँहसे भी झूठ कहला दिया। सुजान शिवजीने मनमें विचार किया कि हरिकी इच्छारूपी भावी प्रबल है॥ ३॥ सतीजीने सीताजीका वेष धारण किया, यह जानकर शिवजीके हृदयमें बड़ा विषाद हुआ। उन्होंने सोचा कि यदि मैं अब सतीसे प्रीति करता हूँ तो भक्तिमार्ग लुप्त हो जाता है और बड़ा अन्याय होता है ॥ ४ ॥ सती परम पवित्र हैं, इसलिये इन्हें छोड़ते भी नहीं बनता और प्रेम करनेमें बड़ा पाप है। प्रकट करके महादेवजी कुछ भी नहीं कहते...