003. भगवान राम के विषय में उमा और शिवजीका संवाद

003. भगवान राम के विषय में उमा और शिवजीका संवाद

जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई ॥ तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सबु जाना ॥ २ ॥

बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूठ कहावा ॥
हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना ॥ ३ ॥

सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा ॥
जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती ॥ ४ ॥

आपने जो कहा वह झूठ नहीं हो सकता, मेरे मनमें यह बड़ा (पूरा) विश्वास है। तब शिवजीने ध्यान करके देखा और सतीजीने जो चरित्र किया था, सब जान लिया ॥ २॥ 

फिर श्रीरामचन्द्रजीकी मायाको सिर नवाया, जिसने प्रेरणा करके सतीके मुँहसे भी झूठ कहला दिया। सुजान शिवजीने मनमें विचार किया कि हरिकी इच्छारूपी भावी प्रबल है॥ ३॥

सतीजीने सीताजीका वेष धारण किया, यह जानकर शिवजीके हृदयमें बड़ा विषाद हुआ। उन्होंने सोचा कि यदि मैं अब सतीसे प्रीति करता हूँ तो भक्तिमार्ग लुप्त हो जाता है और बड़ा अन्याय होता है ॥ ४ ॥

सती परम पवित्र हैं, इसलिये इन्हें छोड़ते भी नहीं बनता और प्रेम करनेमें बड़ा पाप है। प्रकट करके महादेवजी कुछ भी नहीं कहते, परन्तु उनके हृदयमें बड़ा सन्ताप है ॥ ५६ ॥

दो०- परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु ।
प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु ॥ ५६ ॥

तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा ॥
एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं ॥  १ ॥
अस बिचारि संकरु मतिधीरा । चले भवन सुमिरत रघुबीरा ॥ 
चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई ॥ २ ॥

अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना ॥
सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत  सकोचा ॥ ३ ॥

कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला ॥ जदपि सतीं पूछा बहु भाँती । तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती ॥ ४ ॥

तब शिवजीने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें सिर नवाया और श्रीरामजीका स्मरण करते ही उनके मनमें यह आया कि सतीके इस शरीरसे मेरी [पति-पत्नीरूपमें] भेंट नहीं हो सकती और शिवजीने अपने मनमें यह सङ्कल्प कर लिया ॥ १ ॥

स्थिरबुद्धि शङ्करजी ऐसा विचारकर श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते हुए अपने घर (कैलास) को चले। चलते समय सुन्दर आकाशवाणी हुई कि हे महेश! आपकी जय हो। आपने भक्तिकी अच्छी दृढ़ता की ॥ २ ॥

आपको छोड़कर दूसरा कौन ऐसी प्रतिज्ञा कर सकता है? आप श्रीरामचन्द्रजीके भक्त हैं, समर्थ हैं और भगवान् हैं। इस आकाशवाणीको सुनकर सतीजीके मनमें चिन्ता हुई और उन्होंने सकुचाते हुए शिवजीसे पूछा- ॥ ३॥

हे कृपालु ! कहिये, आपने कौन-सी प्रतिज्ञा की है? हे प्रभो! आप सत्यके धाम और दीनदयालु हैं। यद्यपि सतीजीने बहुत प्रकारसे पूछा, परन्तु त्रिपुरारि शिवजीने कुछ न कहा ॥ ४ ॥

दो० - सतीं हृदयँ अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य । 
कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य ।। ५७ (क)॥
सो० - जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि । बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि ।। ५७ (ख)॥
हृदयं सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहिं बरनी ॥ 
कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा ॥ १ ॥
संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी ॥ 
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई ॥ २ ॥
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू । कहीं कथा सुंदर सुखहेतू ॥
बरनत पंथ बिबिध इतिहासा । बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा ॥ ३ ॥
तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बटतर करि कमलासन ।। 
संकर सहज सरूपु सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा ॥ ४ ॥

सतीजीने हृदयमें अनुमान किया कि सर्वज्ञ शिवजी सब जान गये। मैंने शिवजीसे कपट किया, स्त्री स्वभावसे ही मूर्ख और बेसमझ होती हैं ॥ ५७ (क) ॥

प्रीतिकी सुन्दर रीति देखिये कि जल भी [दूधके साथ मिलकर] दूधके समान भाव बिकता है; परन्तु फिर कपटरूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है (दूध फट जाता है) और स्वाद [प्रेम] जाता रहता है ॥ ५७ (ख) ॥

अपनी करनीको याद करके सतीजीके हृदयमें इतना सोच है और इतनी अपार चिन्ता है कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। [उन्होंने समझ लिया कि] शिवजी कृपाके परम अथाह सागर हैं, इससे प्रकटमें उन्होंने मेरा अपराध नहीं कहा ॥ १ ॥

शिवजीका रुख देखकर सतीजीने जान लिया कि स्वामीने मेरा त्याग कर दिया और वे हृदयमें व्याकुल हो उठीं। अपना पाप समझकर कुछ कहते नहीं बनता, परन्तु हृदय [भीतर-ही-भीतर] कुम्हारके आँवेके समान अत्यन्त जलने लगा ॥ २ ॥

वृषकेतु शिवजीने सतीको चिन्तायुक्त जानकर उन्हें सुख देनेके लिये सुन्दर कथाएँ कहीं। इस प्रकार मार्गमें विविध प्रकारके इतिहासोंको कहते हुए विश्वनाथ कैलास जा पहुँचे ॥ ३॥

वहाँ फिर शिवजी अपनी प्रतिज्ञाको याद करके बड़के पेड़के नीचे पद्मासन लगाकर बैठ गये। शिवजीने अपना स्वाभाविक रूप सँभाला। उनकी अखण्ड और अपार समाधि लग गयी ॥ ४॥

दो०- सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं। 
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं ॥ ५८ ॥
नित नव सोचु सती उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा ॥ 
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना ॥ १ ॥
सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा ॥ 
अब बिधि अस बूझिअ नहिं तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही ॥ २ ॥
कहि न जाइ कछु हृदय गलानी । मन महुँ रामहि सुमिर सयानी ॥ 
जौं प्रभु दीनदयालु कहावा । आरति हरन बेद जसु गावा ॥ ३ ॥
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी । छूटउ बेगि देह यह मोरी ॥ 
जौं मोरें सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू ॥ ४ ॥

तब सतीजी कैलासपर रहने लगीं। उनके मनमें बड़ा दुःख था। इस रहस्यको कोई कुछ भी नहीं जानता था। उनका एक-एक दिन युगके समान बीत रहा था ॥ ५८ ॥

सतीजीके हृदयमें नित्य नया और भारी सोच हो रहा था कि मैं इस दुःख समुद्रके पार कब जाऊँगी। मैंने जो श्रीरघुनाथजीका अपमान किया और फिर पतिके वचनोंको झूठ जाना- ॥१॥

उसका फल विधाताने मुझको दिया, जो उचित था वही किया; परन्तु हे विधाता ! अब तुझे यह उचित नहीं है जो शङ्करसे विमुख होनेपर भी मुझे जिला रहा है ॥ २ ॥

सतीजीके हृदयकी ग्लानि कुछ कही नहीं जाती। बुद्धिमती सतीजीने मनमें श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण किया और कहा- हे प्रभो! यदि आप दीनदयालु कहलाते हैं और वेदोंने आपका यह यश गाया है कि आप दुःखको हरनेवाले हैं, ॥ ३ ॥

तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरी यह देह जल्दी छूट जाय। यदि मेरा शिवजीके चरणोंमें प्रेम है और मेरा यह [प्रेमका] व्रत मन, वचन और कर्म (आचरण) से सत्य है, ॥ ४॥

दो०-तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ । 
होइ मरनु जेहिं बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ ॥ ५९ ॥
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी॥ 
बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी ॥ १ ॥
राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे ॥ 
जाइ संभु पद बंदनु कीन्हा। सनमुख संकर आसनु दीन्हा ॥ २ ॥
लगे कहन हरिकथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला ॥
देखा बिधि बिचारि सब लायक । दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक ॥ ३ ॥
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयं तब आवा ॥ 
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥ ४ ॥

तो हे सर्वदर्शी प्रभो! सुनिये और शीघ्र वह उपाय कीजिये जिससे मेरा मरण हो और बिना ही परिश्रम यह [पति-परित्यागरूपी] असह्य विपत्ति दूर हो जाय ॥ ५९ ॥

दक्षसुता सतीजी इस प्रकार बहुत दुःखित थीं, उनको इतना दारुण दुःख था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सत्तासी हजार वर्ष बीत जानेपर अविनाशी शिवजीने समाधि खोली ॥ १॥ 

शिवजी रामनामका स्मरण करने लगे, तब सतीजीने जाना कि अब जगत्‌के स्वामी (शिवजी) जागे। उन्होंने जाकर शिवजीके चरणोंमें प्रणाम किया। शिवजीने उनको बैठनेके लिये सामने आसन दिया ॥ २ ॥ 

शिवजी भगवान् हरिकी रसमयी कथाएँ कहने लगे। उसी समय दक्ष प्रजापति हुए। ब्रह्माजीने सब प्रकारसे योग्य देख-समझकर दक्षको प्रजापतियोंका नायक बना दिया ॥ ३॥

जब दक्षने इतना बड़ा अधिकार पाया तब उनके हृदयमें अत्यन्त अभिमान आ गया। जगत्में ऐसा कोई नहीं पैदा हुआ जिसको प्रभुता पाकर मद न हो ॥४॥

दो० - दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग। 
नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग ॥ ६०॥
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा । बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा ॥ 
बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई ॥ १ ॥
सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना ॥
सुर सुंदरी करहिं कल गाना । सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना ॥ २ ॥
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी । पिता जग्य सुनि कछु हरषानी ॥ 
जौं महेसु मोहि आयसु देहीं । कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं ॥ ३ ॥
पति परित्याग हृदयँ दुखु भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी ॥ 
बोली सती मनोहर बानी । भय संकोच प्रेम रस सानी ।। ४ ॥

दक्षने सब मुनियोंको बुला लिया और वे बड़ा यज्ञ करने लगे। जो देवता यज्ञका भाग पाते हैं, दक्षने उन सबको आदरसहित निमन्त्रित किया ॥ ६० ॥

[दक्षका निमन्त्रण पाकर] किन्नर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व और सब देवता अपनी-अपनी स्त्रियोंसहित चले। विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजीको छोड़कर सभी देवता अपना-अपना विमान सजाकर चले ॥ १ ॥

सतीजीने देखा अनेकों प्रकारके सुन्दर विमान आकाशमें चले जा रहे हैं। देव-सुन्दरियाँ मधुर गान कर रही हैं, जिन्हें सुनकर मुनियोंका ध्यान छूट जाता है ॥ २ ॥

सतीजीने [विमानोंमें देवताओंके जानेका कारण] पूछा, तब शिवजीने सब बातें बतलायीं। पिताके यज्ञकी बात सुनकर सती कुछ प्रसन्न हुईं और सोचने लगीं कि यदि महादेवजी मुझे आज्ञा दें, तो इसी बहाने कुछ दिन पिताके घर जाकर रहूँ ॥ ३ ॥

क्योंकि उनके हृदयमें पतिद्वारा त्यागी जानेका बड़ा भारी दुःख था, पर अपना अपराध समझकर वे कुछ कहती न थीं। आखिर सतीजी भय, संकोच और प्रेमरसमें सनी हुई मनोहर वाणीसे बोलीं- ॥ ४ ॥

दो०- पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ। 
तौ मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ ॥ ६१ ॥
कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा । यह अनुचित नहिं नेवत पठावा ॥
दच्छ सकल निज सुता बोलाईं। हमरें बयर तुम्हउ बिसराईं ॥ १ ॥
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना । तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना ॥ 
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी । रहइ न सीलु सनेहु न कानी ॥ २ ॥
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा । जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा ॥
तदपि बिरोध मान जहँ कोई । तहाँ गएँ कल्यानु न होई ॥ ३ ॥
भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा ॥ 
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ ॥ ४ ॥

हे प्रभो! मेरे पिताके घर बहुत बड़ा उत्सव है। यदि आपकी आज्ञा हो तो हे कृपाधाम ! मैं आदरसहित उसे देखने जाऊँ ॥ ६१ ॥

शिवजीने कहा-तुमने बात तो अच्छी कही, यह मेरे मनको भी पसंद आयी। पर उन्होंने न्योता नहीं भेजा, यह अनुचित है। दक्षने अपनी सब लड़कियोंको बुलाया है; किन्तु हमारे वैरके कारण उन्होंने तुमको भी भुला दिया ॥ १ ॥

एक बार ब्रह्माकी सभामें हमसे अप्रसन्न हो गये थे, उसीसे वे अब भी हमारा अपमान करते हैं। हे भवानी ! जो तुम बिना बुलाये जाओगी तो न शील-स्नेह ही रहेगा और न मान-मर्यादा ही रहेगी ॥ २ ॥
 
यद्यपि इसमें सन्देह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरुके घर बिना बुलाये भी जाना चाहिये तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जानेसे कल्याण नहीं होता ॥ ३ ॥

शिवजीने बहुत प्रकारसे समझाया, पर होनहारवश सतीके हृदयमें बोध नहीं हुआ। फिर शिवजीने कहा कि यदि बिना बुलाये जाओगी, तो हमारी समझमें अच्छी बात न होगी ॥ ४ ॥

दो०- कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि । 
दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि ॥ ६२ ॥
पिता भवन जब गईं भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी ॥ 
सादर भलेहिं मिली एक माता । भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता ॥ १ ॥
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता । सतिहि बिलोकि जरे सब गाता ॥ 
सतीं जाइ देखेउ तब जागा । कतहुँ न दीख संभु कर भागा ॥ २ ॥
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ । प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ ॥
पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा । जस यह भयउ महा परितापा ॥ ३ ॥
जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना ॥ 
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा ॥ ४ ॥

शिवजीने बहुत प्रकारसे कहकर देख लिया, किन्तु जब सती किसी प्रकार भी नहीं रुकीं, तब त्रिपुरारि महादेवजीने अपने मुख्य गणोंको साथ देकर उनको विदा कर दिया ॥ ६२ ॥

भवानी जब पिता (दक्ष) के घर पहुँचीं, तब दक्षके डरके मारे किसीने उनकी आवभगत नहीं की, केवल एक माता भले ही आदरसे मिली। बहिनें बहुत मुसकराती हुई मिलीं ॥ १ ॥

दक्षने तो उनकी कुछ कुशलतक नहीं पूछी, सतीजीको देखकर उलटे उनके सारे अङ्ग जल उठे। तब सतीने जाकर यज्ञ देखा तो वहाँ कहीं शिवजीका भाग दिखायी नहीं दिया ॥ २॥

तब शिवजीने जो कहा था वह उनकी समझमें आया। स्वामीका अपमान समझकर सतीका हृदय जल उठा। पिछला (पतिपरित्यागका) दुःख उनके हृदयमें उतना नहीं व्यापा था, जितना महान् दुःख इस समय (पति-अपमानके कारण) हुआ ॥ ३ ॥

यद्यपि जगत्में अनेक प्रकारके दारुण दुःख हैं, तथापि जाति-अपमान सबसे बढ़कर कठिन है। यह समझकर सतीजीको बड़ा क्रोध हो आया। माताने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया-बुझाया ॥ ४ ॥

दो०- सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध । 
सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध ॥ ६३ ॥

परन्तु उनसे शिवजीका अपमान सहा नहीं गया, इससे उनके हृदयमें कुछ भी प्रबोध नहीं हुआ। तब वे सारी सभाको हठपूर्वक डाँटकर क्रोधभरे वचन बोलीं- ॥ ६३॥

सुनहु सभासद सकल मुनिंदा । कही सुनी जिन्ह संकर निंदा ॥ 
सो फलु तुरत लहब सब काहूँ । भली भाँति पछिताब पिताहूँ ॥ १ ॥

हे सभासदो और सब मुनीश्वरो ! सुनो। जिन लोगोंने यहाँ शिवजीकी निन्दा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तुरंत ही मिलेगा और मेरे पिता दक्ष भी भलीभाँति पछतायेंगे ॥ १ ॥

संत संभु श्रीपति अपबादा । सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा ॥ 
काटिअ तासु जीभ जो बसाई । श्रवन मूदि न त चलिअ पराई ॥ २ ॥

जहाँ संत, शिवजी और लक्ष्मीपति विष्णुभगवान्‌की निन्दा सुनी जाय वहाँ ऐसी मर्यादा है कि यदि अपना वश चले तो उस (निन्दा करनेवाले) की जीभ काट ले और नहीं तो कान मूंदकर वहाँसे भाग जाय ॥ २ ॥

जगदातमा महेसु पुरारी । जगत जनक सब के हितकारी ॥ पिता मंदमति निंदत तेही । दच्छ सुक्र संभव यह देही ॥ ३ ॥

त्रिपुर दैत्यको मारनेवाले भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण जगत्‌के आत्मा हैं, वे जगत्पिता और सबका हित करनेवाले हैं। मेरा मन्दबुद्धि पिता उनकी निन्दा करता है; और मेरा यह शरीर दक्षहीके वीर्यसे उत्पन्न है ॥ ३ ॥

तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू । उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू ॥ 
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा । भयउ सकल मख हाहाकारा ॥ ४ ॥

इसलिये चन्द्रमाको ललाटपर धारण करनेवाले वृषकेतु शिवजीको हृदयमें धारण करके मैं इस शरीरको तुरंत ही त्याग दूँगी। ऐसा कहकर सतीजीने योगाग्निमें अपना शरीर भस्म कर डाला। सारी यज्ञशालामें हाहाकार मच गया ॥ ४॥

दो०- सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस। 
जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस ॥ ६४ ॥

सतीका मरण सुनकर शिवजीके गण यज्ञ विध्वंस करने लगे। यज्ञ विध्वंस होते देखकर मुनीश्वर भृगुजीने उसकी रक्षा की ॥ ६४॥ 

समाचार सब संकर पाए । बीरभद्रु करि कोप पठाए॥
जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा । सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा ॥ १ ॥

ये सब समाचार शिवजीको मिले, तब उन्होंने क्रोध करके वीरभद्रको भेजा। उन्होंने वहाँ जाकर यज्ञ विध्वंस कर डाला और सब देवताओंको यथोचित फल (दण्ड) दिया ॥ १॥ 

भै जगबिदित दच्छ गति सोई । जसि कछु संभु बिमुख कै होई ॥ 
यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी ॥ २ ॥

दक्षकी जगत्प्रसिद्ध वही गति हुई जो शिवद्रोहीकी हुआ करती है। यह इतिहास सारा संसार जानता है, इसलिये मैंने संक्षेपमें वर्णन किया ॥ २ ॥

सतीं मरत हरि सन बरु मागा । जनम जनम सिव पद अनुरागा ॥ 
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई । जनमीं पारबती तनु पाई ॥ ३ ॥

सतीने मरते समय भगवान् हरिसे यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्ममें शिवजीके चरणोंमें अनुराग रहे। इसी कारण उन्होंने हिमाचलके घर जाकर पार्वतीके शरीरसे जन्म लिया ॥ ३ ॥

जब तें उमा सैल गृह जाईं । सकल सिद्धि संपति तहँ छाईं ॥ 
जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे । उचित बास हिम भूधर दीन्हे ॥ ४ ॥

जबसे उमाजी हिमाचलके घर जन्मीं तबसे वहाँ सारी सिद्धियाँ और सम्पत्तियाँ छा गयीं। मुनियोंने जहाँ-तहाँ सुन्दर आश्रम बना लिये और हिमाचलने उनको उचित स्थान दिये ॥ ४॥

दो०- सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति। 
प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति ॥ ६५ ॥

उस सुन्दर पर्वतपर बहुत प्रकारके सब नये-नये वृक्ष सदा पुष्प-फलयुक्त हो गये और वहाँ बहुत तरहकी मणियोंकी खानें प्रकट हो गयीं ॥ ६५ ॥

सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं ॥ 
सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा । गिरि पर सकल करहिं अनुरागा ॥ १ ॥

सारी नदियोंमें पवित्र जल बहता है और पक्षी, पशु, भ्रमर सभी सुखी रहते हैं। सब जीवोंने अपना स्वाभाविक वैर छोड़ दिया और पर्वतपर सभी परस्पर प्रेम करते हैं ॥ १ ॥ 

सोह सैल गिरिजा गृह आएँ । जिमि जनु रामभगति के पाएँ ॥
नित नूतन मंगल गृह तासू । ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू॥ २ ॥

पार्वतीजीके घर आ जानेसे पर्वत ऐसा शोभायमान हो रहा है जैसा रामभक्तिको पाकर भक्त शोभायमान होता है। उस (पर्वतराज) के घर नित्य नये-नये मङ्गलोत्सव होते हैं, जिसका ब्रह्मादि यश गाते हैं॥ २॥ 

 नारद समाचार सब पाए । कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए ॥
सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा ॥ ३ ॥

जब नारदजीने ये सब समाचार सुने तो वे कौतुकहीसे हिमाचलके घर पधारे। पर्वतराजने उनका बड़ा आदर किया और चरण धोकर उनको उत्तम आसन दिया ॥ ३ ॥

नारि सहित मुनि पद सिरु नावा । चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा ।। 
निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना ॥ ४ ॥

फिर अपनी स्त्रीसहित मुनिके चरणोंमें सिर नवाया और उनके चरणोदकको सारे घरमें छिड़काया। हिमाचलने अपने सौभाग्यका बहुत बखान किया और पुत्रीको बुलाकर मुनिके चरणोंपर डाल दिया ॥ ४॥

दो०- त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।
कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि ॥ ६६ ॥

[और कहा-] हे मुनिवर! आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, आपकी सर्वत्र पहुँच है। अतः आप हृदयमें विचारकर कन्याके दोष-गुण कहिये ॥ ६६ ॥

कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी ॥ 
सुंदर सहज सुसील सयानी । नाम उमा अंबिका भवानी ॥ १ ॥

नारद मुनिने हँसकर रहस्ययुक्त कोमल वाणीसे कहा- तुम्हारी कन्या सब गुणोंकी खान है। यह स्वभावसे ही सुन्दर, सुशील और समझदार है। उमा, अम्बिका और भवानी इसके नाम हैं॥ १ ॥ 

सब लच्छन संपन्न कुमारी । होइहि संतत पियहि पिआरी ॥ 
सदा अचल एहि कर अहिवाता । एहि तें जसु पैहहिं पितु माता ॥ २ ॥

कन्या सब सुलक्षणोंसे सम्पन्न है, यह अपने पतिको सदा प्यारी होगी। इसका सुहाग सदा अचल रहेगा और इससे इसके माता-पिता यश पावेंगे ॥ २ ॥

होइहि पूज्य सकल जग माहीं । एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं ॥
एहि कर नामु सुमिरि संसारा । त्रिय चढ़िहहिं पतिव्रत असिधारा ॥ ३ ॥

यह सारे जगत्में पूज्य होगी और इसकी सेवा करनेसे कुछ भी दुर्लभ न होगा। संसारमें स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतिव्रतरूपी तलवारकी धारपर चढ़ जायँगी ॥ ३ ॥

सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी । सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी ॥ 
अगुन अमान मातु पितु हीना । उदासीन सब संसय छीना ॥ ४ ॥

हे पर्वतराज। तुम्हारी कन्या सुलच्छनी है। अब इसमें जो दो-चार अवगुण हैं, उन्हें भी सुन लो। गुणहीन, मानहीन, माता-पिता-विहीन, उदासीन, संशयहीन (लापरवाह), ॥४॥

दो०-जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष। 
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख ॥ ६७॥

योगी, जटाधारी, निष्कामहृदय, नंगा और अमङ्गल वेषवाला, ऐसा पति इसको मिलेगा। इसके हाथमें ऐसी ही रेखा पड़ी है॥ ६७॥

सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी ॥ 
नारदहूँ यह भेदु न जाना । दसा एक समुझब बिलगाना ॥ १ ॥

नारद मुनिकी वाणी सुनकर और उसको हृदयमें सत्य जानकर पति-पत्नी (हिमवान् और मैना) को दुःख हुआ और पार्वतीजी प्रसन्न हुईं। नारदजीने भी इस रहस्यको नहीं जाना, क्योंकि सबकी बाहरी दशा एक-सी होनेपर भी भीतरी समझ भिन्न-भिन्न थी ॥ १॥

सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना ॥ 
होइ न मृषा देवरिषि भाषा । उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा ॥ २ ॥

सारी सखियाँ, पार्वती, पर्वतराज हिमवान् और मैना सभीके शरीर पुलकित थे और सभीके नेत्रोंमें जल भरा था। देवर्षिके वचन असत्य नहीं हो सकते, [यह विचारकर] पार्वतीने उन वचनोंको हृदयमें धारण कर लिया ॥ २ ॥

उपजेउ सिव पद कमल सनेहू । मिलन कठिन मन भा संदेहू ॥ 
जानि कुअवसरु प्रीति दुराई । सखी उछँग बैठी पुनि जाई ॥ ३ ॥

उन्हें शिवजीके चरणकमलोंमें नेह उत्पन्न हो आया, परन्तु मनमें यह सन्देह हुआ कि उनका मिलना कठिन है। अवसर ठीक न जानकर उमाने अपने प्रेमको छिपा लिया और फिर वे सखोकी गोदमें जाकर बैठ गयीं ॥ ३ ॥

झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहिं दंपति सखीं सयानी ॥ 
उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ । कहहु नाथ का करिअ उपाऊ ॥ ४ ॥

देवर्षिकी वाणी झूठी न होगी, यह विचारकर हिमवान्, मैना और सारी चतुर सखियाँ चिन्ता करने लगीं। फिर हृदयमें धीरज धरकर पर्वतराजने कहा- हे नाथ। कहिये, अब क्या उपाय किया जाय ? ॥४॥

दो०- कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार। 
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार ॥ ६८ ॥

मुनीश्वरने कहा- हे हिमवान् । सुनो, विधाताने ललाटपर जो कुछ लिख दिया है, उसको देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते ॥ ६८ ॥

तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होड़ करै जौं दैउ सहाई ॥ 
जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं ।। १ ॥

तो भी एक उपाय मैं बताता हूँ। यदि दैव सहायता करें तो वह सिद्ध हो सकता है। उमाको वर तो निःसन्देह वैसा ही मिलेगा जैसा मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया है॥ १॥

जे जे बर के दोष बखाने । ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने । 
जौं बिबाहु संकर सन होई । दोषउ गुन सम कह सबु कोई ॥ २ ॥

परन्तु मैंने वरके जो-जो दोष बतलाये हैं, मेरे अनुमानसे वे सभी शिवजीमें हैं। यदि शिवजीके साथ विवाह हो जाय तो दोषोंको भी सब लोग गुणोंके समान ही कहेंगे ॥ २॥

जौं अहि सेज सयन हरि करहीं । बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं ।॥ 
भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं । तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं ॥ ३ ॥

जैसे विष्णुभगवान् शेषनागकी शय्यापर सोते हैं, तो भी पण्डित लोग उनको कोई दोष नहीं लगाते। सूर्य और अग्निदेव अच्छे-बुरे सभी रसोंका भक्षण करते हैं, परन्तु उनको कोई बुरा नहीं कहता ॥ ३ ॥

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई ॥ 
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं ॥ ४ ॥

गङ्गाजीमें शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता। सूर्य, अग्नि और गङ्गाजीकी भाँति समर्थको कुछ दोष नहीं लगता ॥ ४॥

दो० - जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान । 
परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान ॥ ६९ ॥

यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञानके अभिमानसे इस प्रकार होड़ करते हैं तो वे कल्पभरके लिये नरकमें पड़ते हैं। भला, कहीं जीव भी ईश्वरके समान (सर्वथा स्वतन्त्र) हो सकता है ? ॥ ६९ ॥

सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना ॥ 
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें । ईस अनीसहि अंतरु तैसें ॥ १ ॥

गङ्गाजलसे भी बनायी हुई मदिराको जानकर संत लोग कभी उसका पान नहीं करते। पर वही गङ्गाजीमें मिल जानेपर जैसे पवित्र हो जाती है, ईश्वर और जीवमें भी वैसा ही भेद है॥१॥

संभु सहज समरथ भगवाना । एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना ॥ 
दुराराध्य पै अहहिं महेसू । आसुतोष पुनि किएँ कलेसू ॥ २ ॥

शिवजी सहज ही समर्थ हैं, क्योंकि वे भगवान हैं। इसलिये इस विवाहमें सब प्रकार कल्याण है। परन्तु महादेवजीकी आराधना बड़ी कठिन है, फिर भी क्लेश (तप) करनेसे वे बहुत जल्द सन्तुष्ट हो जाते हैं॥ २॥

जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी । भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी ॥ 
जद्यपि बर अनेक जग माहीं । एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं॥ ३ ॥

यदि तुम्हारी कन्या तप करे, तो त्रिपुरारि महादेवजी होनहारको मिटा सकते हैं। यद्यपि संसारमें वर अनेक हैं, पर इसके लिये शिवजीको छोड़कर दूसरा वर नहीं है ॥ ३॥

बर दायक प्रनतारति भंजन । कृपासिंधु सेवक मन रंजन ॥ 
इच्छित फल बिनु सिव अवराधें । लहिअ न कोटि जोग जप साधें ॥ ४ ॥

शिवजी वर देनेवाले, शरणागतोंके दुःखोंका नाश करनेवाले, कृपाके समुद्र और सेवकोंके मनको प्रसन्न करनेवाले हैं। शिवजीकी आराधना किये बिना करोड़ों योग और जप करनेपर भी वाञ्छित फल नहीं मिलता ॥ ४ ॥

दो० - अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस। 
होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस ॥ ७० ॥

ऐसा कहकर भगवान्‌का स्मरण करके नारदजीने पार्वतीको आशीर्वाद दिया। [और कहा कि-] हे पर्वतराज ! तुम सन्देहका त्याग कर दो, अब यह कल्याण ही होगा ॥ ७० ॥

कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ । आगिल चरित सुनहु जस भयऊ ॥ 
पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना ॥ १ ॥

यों कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोकको चले गये। अब आगे जो चरित्र हुआ उसे सुनो। पतिको एकान्तमें पाकर मैनाने कहा- हे नाथ! मैंने मुनिके वचनोंका अर्थ नहीं समझा ॥ १॥

जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा । करिअ बिबाहु सुता अनुरूपा ॥ 
न त कन्या बरु रहउ कुआरी । कंत उमा मम प्रानपिआरी ॥ २ ॥

जो हमारी कन्याके अनुकूल घर, वर और कुल उत्तम हो तो विवाह कीजिये। नहीं तो लड़की चाहे कुमारी ही रहे (मैं अयोग्य वरके साथ उसका विवाह नहीं करना चाहती); क्योंकि हे स्वामिन् ! पार्वती मुझको प्राणोंके समान प्यारी है ॥ २॥

जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू ॥ 
सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू॥ ३ ॥

यदि पार्वतीके योग्य वर न मिला तो सब लोग कहेंगे कि पर्वत स्वभावसे ही जड (मूर्ख) होते हैं। हे स्वामी! इस बातको विचारकर ही विवाह कीजियेगा, जिसमें फिर पीछे हृदयमें सन्ताप न हो ॥ ३॥

अस कहि परी चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा ॥ 
बरु पावक प्रगटै ससि माहीं । नारद बचनु अन्यथा नाहीं ॥ ४ ॥

इस प्रकार कहकर मैना पतिके चरणोंपर मस्तक रखकर गिर पड़ीं। तब हिमवान्ने प्रेमसे कहा-चाहे चन्द्रमामें अग्नि प्रकट हो जाय, पर नारदजीके वचन झूठे नहीं हो सकते ॥ ४॥

दो०- प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान । 
पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान ॥ ७१ ॥

हे प्रिये ! सब सोच छोड़कर श्रीभगवान्‌का स्मरण करो। जिन्होंने पार्वतीको रचा है, वे ही कल्याण करेंगे ॥ ७१ ॥

अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू । तौ अस जाइ सिखावनु देहू ॥ 
करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू । आन उपायँ न मिटिहि कलेसू ॥ १ ॥

अब यदि तुम्हें कन्यापर प्रेम है तो जाकर उसे यह शिक्षा दो कि वह ऐसा तप करे जिससे शिवजी मिल जायें। दूसरे उपायसे यह क्लेश नहीं मिटेगा ॥ १॥

नारद बचन सगर्भ सहेतू । सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू ॥ 
अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका । सबहि भाँति संकरु अकलंका ॥ २ ॥

नारदजीके वचन रहस्यसे युक्त और सकारण हैं और शिवजी समस्त सुन्दर गुणोंके भण्डार हैं। यह विचारकर तुम [मिथ्या] सन्देहको छोड़ दो। शिवजी सभी तरहसे निष्कलङ्क हैं॥ २॥

सुनि पति बचन हरषि मन माहीं । गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं ॥ 
उमहि बिलोकि नयन भरे बारी । सहित सनेह गोद बैठारी ॥ ३ ॥

पतिके वचन सुन मनमें प्रसन्न होकर मैना उठकर तुरंत पार्वतीके पास गयीं। पार्वतीको देखकर उनकी आँखोंमें आँसू भर आये। उसे स्नेहके साथ गोदमें बैठा लिया ॥ ३ ॥

बारहिं बार लेति उर लाई । गदगद कंठ न कछु कहि जाई ॥ 
जगत मातु सर्बग्य भवानी । मातु सुखद बोलीं मृदु बानी ॥ ४ ॥

फिर बार-बार उसे हृदयसे लगाने लगीं। प्रेमसे मैनाका गला भर आया, कुछ कहा नहीं जाता। जगज्जननी भवानीजी तो सर्वज्ञ ठहरीं। [माताके मनकी दशाको जानकर वे माताको सुख देनेवाली कोमल वाणीसे बोलीं- ॥ ४॥

दो०- सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि। 
सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि ॥ ७२ ॥

मा! सुन, मैं तुझे सुनाती है: मैंने ऐसा स्वप्न देखा है कि मुझे एक सुन्दर गौरवर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणने ऐसा उपदेश दिया है- ॥ ७२ ॥

करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी ॥ 
मातु पितहि पनि यह मत भावा । तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा ॥ १ ॥

हे पार्वती! नारदजीने जो कहा है, उसे सत्य समझकर तू जाकर तप कर। फिर यह बात तेरे माता-पिताको भी अच्छी लगी है। तप सुख देनेवाला और दुःख-दोषका नाश करनेवाला है॥ १॥

तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता । तपबल बिष्नु सकल जग त्राता ॥ 
तपबल संभु करहिं संघारा । तपबल सेषु धरइ महिभारा ॥ २ ॥

तपके बलसे ही ब्रह्मा संसारको रचते हैं और तपके बलसे ही विष्णु सारे जगत्‌का पालन करते हैं। तपके बलसे ही शम्भु [ रुद्ररूपसे जगत्का] संहार करते हैं और तपके बलसे ही शेषजी पृथ्वीका भार धारण करते हैं॥ २॥

तप अधार सब सृष्टि भवानी । करहि जाइ तपु अस जियँ जानी ॥ 
सुनत बचन बिसमित महतारी । सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी ॥ ३ ॥

हे भवानी! सारी सृष्टि तपके ही आधारपर है। ऐसा जीमें जानकर तू जाकर तप कर। यह बात सुनकर माताको बड़ा अचरज हुआ और उसने हिमवान्‌को बुलाकर वह स्वप्न सुनाया ॥ ३॥

मातु पितहि बहुबिधि समुझाई । चलीं उमा तप हित हरषाई ॥ 
प्रिय परिवार पिता अरु माता । भए बिकल मुख आव न बाता ॥ ४ ॥

माता-पिताको बहुत तरहसे समझाकर बड़े हर्षके साथ पार्वतीजी तप करनेके लिये चलीं। प्यारे कुटुम्बी, पिता और माता सब व्याकुल हो गये। किसीके मुँहसे बात नहीं निकलती ॥ ४ ॥

दो०- बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ । 
पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ ॥ ७३॥

तब वेदशिरा मुनिने आकर सबको समझाकर कहा। पार्वतीजीकी महिमा सुनकर सबको समाधान हो गया ॥ ७३ ॥

उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना ॥ 
अति सुकुमार न तनु तप जोगू । पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू ॥ १ ॥

प्राणपति (शिवजी) के चरणोंको हृदयमें धारण करके पार्वतीजी वनमें जाकर तप करने लगीं। पार्वतीजीका अत्यन्त सुकुमार शरीर तपके योग्य नहीं था, तो भी पतिके चरणोंका स्मरण करके उन्होंने सब भोगोंको तज दिया ॥ १ ॥

नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा ॥ 
संबत सहस मूल फल खाए । सागु खाइ सत बरष गवाँए ॥ २ ॥

स्वामीके चरणोंमें नित्य नया अनुराग उत्पन्न होने लगा और तपमें ऐसा मन लगा कि शरीरकी सारी सुध बिसर गयी। एक हजार वर्षतक उन्होंने मूल और फल खाये, फिर सौ वर्ष साग खाकर बिताये ॥ २ ॥

कछु दिन भोजनु बारि बतासा । किए कठिन कछु दिन उपबासा ।। 
बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई ॥ ३ ॥

कुछ दिन जल और वायुका भोजन किया और फिर कुछ दिन कठोर उपवास किये। जो बेलपत्र सूखकर पृथ्वीपर गिरते थे, तीन हजार वर्षतक उन्हींको खाया ॥ ३ ॥

पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भयउ अपरना ॥ 
देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा ॥ ४ ॥

फिर सूखे पर्ण (पत्ते) भी छोड़ दिये, तभी पार्वतीका नाम 'अपर्णा' हुआ। तपसे उमाका शरीर क्षीण देखकर आकाशसे गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई- ॥४॥

दो०- भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारि । 
परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि ॥ ७४ ॥

हे पर्वतराजकी कुमारी ! सुन, तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू अब सारे असह्य क्लेशोंको (कठिन तपको) त्याग दे। अब तुझे शिवजी मिलेंगे ॥ ७४ ॥

अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी । भए अनेक धीर मुनि ग्यानी ॥ 
अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी । सत्य सदा संतत सुचि जानी ॥ १ ॥

हे भवानी! धीर, मुनि और ज्ञानी बहुत हुए हैं, पर ऐसा (कठोर) तप किसीने नहीं किया। अब तू इस श्रेष्ठ ब्रह्माकी वाणीको सदा सत्य और निरन्तर पवित्र जानकर अपने हृदयमें धारण कर ॥ १॥

आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं ॥ 
मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा । जानेहु तब प्रमान बागीसा ॥ २ ॥

जब तेरे पिता बुलानेको आवें, तब हठ छोड़कर घर चली जाना और जब तुम्हें सप्तर्षि मिलें तब इस वाणीको ठीक समझना ॥ २ ॥

सुनत गिरा बिधि गगन बखानी । पुलक गात गिरिजा हरषानी ॥ 
उमा चरित सुंदर मैं गावा । सुनहु संभु कर चरित सुहावा ॥ ३ ॥

[इस प्रकार ] आकाशसे कही हुई ब्रह्माकी वाणीको सुनते ही पार्वतीजी प्रसन्न हो गयीं और [हर्षके मारे] उनका शरीर पुलकित हो गया। [याज्ञवल्क्यजी भरद्वाजजीसे बोले कि] मैंने पार्वतीका सुन्दर चरित्र सुनाया, अब शिवजीका सुहावना चरित्र सुनो ॥ ३ ॥

जब तें सतीं जाइ तनु त्यागा। तब तें सिव मन भयउ बिरागा ॥ 
जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा ॥ ४ ॥

जबसे सतीने जाकर शरीरत्याग किया, तबसे शिवजीके मनमें वैराग्य हो गया। वे सदा श्रीरघुनाथजीका नाम जपने लगे और जहाँ-तहाँ श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी कथाएँ सुनने लगे ॥४॥

दो०- चिदानंद सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम। 
बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम ॥ ७५ ॥

चिदानन्द, सुखके धाम, मोह, मद और कामसे रहित शिवजी सम्पूर्ण लोकोंको आनन्द देनेवाले भगवान् श्रीहरि (श्रीरामचन्द्रजी) को हृदयमें धारण कर (भगवान्‌के ध्यानमें मस्त हुए) पृथ्वीपर विचरने लगे ॥ ७५ ॥

कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना ॥ 
जदपि अकाम तदपि भगवाना । भगत बिरह दुख दुखित सुजाना ॥ १ ॥

वे कहीं मुनियोंको ज्ञानका उपदेश करते और कहीं श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करते थे। यद्यपि सुजान शिवजी निष्काम हैं, तो भी वे भगवान् अपने भक्त (सती) के वियोगके दुःखसे दुःखी हैं॥ १॥

एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती । नित नै होइ राम पद प्रीती ॥ 
नेमु प्रेमु संकर कर देखा । अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा ॥ २ ॥

इस प्रकार बहुत समय बीत गया। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें नित नयी प्रीति हो रही है। शिवजीके [कठोर] नियम, [अनन्य] प्रेम और उनके हृदयमें भक्तिकी अटल टेकको [जब श्रीरामचन्द्रजीने] देखा, ॥ २ ॥

प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला । रूप सील निधि तेज बिसाला ॥ 
बहु प्रकार संकरहि सराहा । तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा ॥ ३ ॥

तब कृतज्ञ (उपकार माननेवाले), कृपालु, रूप और शीलके भण्डार, महान् तेजपुञ्ज भगवान् श्रीरामचन्द्रजी प्रकट हुए। उन्होंने बहुत तरहसे शिवजीकी सराहना की और कहा कि आपके बिना ऐसा (कठिन) व्रत कौन निबाह सकता है ॥ ३ ॥

बहुबिधि राम सिवहि समुझावा । पारबती कर जन्मु सुनावा ॥ 
अति पुनीत गिरिजा कै करनी । बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी ॥ ४ ॥

श्रीरामचन्द्रजीने बहुत प्रकारसे शिवजीको समझाया और पार्वतीजीका जन्म सुनाया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने विस्तारपूर्वक पार्वतीजीकी अत्यन्त पवित्र करनीका वर्णन किया ॥ ४॥

दो०- अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु । 
जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु ॥ ७६ ॥

[फिर उन्होंने शिवजीसे कहा- हे शिवजी! यदि मुझपर आपका स्नेह है तो अब आप मेरी विनती सुनिये। मुझे यह माँगे दीजिये कि आप जाकर पार्वतीके साथ विवाह कर लें ॥ ७६ ॥

कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं ॥ 
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा ॥ १ ॥

शिवजीने कहा-यद्यपि ऐसा उचित नहीं है, परन्तु स्वामीकी बात भी मेटी नहीं जा सकती। हे नाथ! मेरा यही परम धर्म है कि मैं आपकी आज्ञाको सिरपर रखकर उसका पालन करूँ ॥ १॥

मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ॥ 
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी । अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी ॥ २ ॥

माता, पिता, गुरु और स्वामीकी बातको बिना ही विचारे शुभ समझकर करना (मानना) चाहिये। फिर आप तो सब प्रकारसे मेरे परम हितकारी हैं। हे नाथ! आपकी आज्ञा मेरे सिरपर है ॥ २ ॥

प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना ॥ 
कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ ॥ ३ ॥

शिवजीकी भक्ति, ज्ञान और धर्मसे युक्त वचनरचना सुनकर प्रभु रामचन्द्रजी सन्तुष्ट हो गये। प्रभुने कहा- हे हर! आपकी प्रतिज्ञा पूरी हो गयी। अब हमने जो कहा है उसे हृदयमें रखना ॥ ३ ॥

अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी ॥ 
तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए । बोले प्रभु अति बचन सुहाए । ४ ॥

इस प्रकार कहकर श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्धान हो गये। शिवजीने उनकी वह मूर्ति अपने हृदयमें रख ली। उसी समय सप्तर्षि शिवजीके पास आये। प्रभु महादेवजीने उनसे अत्यन्त सुहावने वचन कहे - ॥४॥

दो०- पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु । 
गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु ॥ ७७ ॥

आपलोग पार्वतीके पास जाकर उनके प्रेमकी परीक्षा लीजिये और हिमाचलको कहकर [उन्हें पार्वतीको लिवा लानेके लिये भेजिये तथा] पार्वतीको घर भिजवाइये और उनके सन्देहको दूर कीजिये ॥ ७७ ॥

रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी । मूरतिमंत तपस्या जैसी ॥ 
बोले मुनि सुनु सैलकुमारी । करहु कवन कारन तपु भारी ॥ १ ॥

ऋषियोंने [वहाँ जाकर] पार्वतीको कैसी देखा, मानो मूर्तिमान् तपस्या ही हो। मुनि बोले-हे शैलकुमारी! सुनो, तुम किसलिये इतना कठोर तप कर रही हो?॥ १॥

केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू । हम सन सत्य मरमु किन कहहू ॥ 
कहत बचन मनु अति सकुचाई । हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई ॥ २ ॥

तुम किसकी आराधना करती हो और क्या चाहती हो? हमसे अपना सच्चा भेद क्यों नहीं कहतीं? [पार्वतीने कहा- ] बात कहते मन बहुत सकुचाता है। आपलोग मेरी मूर्खता सुनकर हँसेंगे ॥ २ ॥

मनु हठ परा न सुनइ सिखावा । चहत बारि पर भीति उठावा ॥ 
नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना ॥ ३ ॥

मनने हठ पकड़ लिया है, वह उपदेश नहीं सुनता और जलपर दीवाल उठाना चाहता है। नारदजीने जो कह दिया उसे सत्य जानकर मैं बिना ही पाँखके उड़ना चाहती हूँ ॥ ३॥

देखहु मुनि अबिबेकु हमारा । चाहिअ सदा सिवहि भरतारा ॥ ४ ॥

हे मुनियो! आप मेरा अज्ञान तो देखिये कि मैं सदा शिवजीको ही पति बनाना चाहती हूँ ॥४॥ 

दो०- सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह।
नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह ॥ ७८ ॥

पार्वतीजीकी बात सुनते ही ऋषिलोग हँस पड़े और बोले- तुम्हारा शरीर पर्वतसे ही तो उत्पन्न हुआ है। भला, कहो तो नारदका उपदेश सुनकर आजतक किसका घर बसा है ? ॥ ७८ ॥

दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई । तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई ॥ 
चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला ॥ १ ॥

उन्होंने जाकर दक्षके पुत्रोंको उपदेश दिया था, जिससे उन्होंने फिर लौटकर घरका मुँह भी नहीं देखा। चित्रकेतुके घरको नारदने ही चौपट किया। फिर यही हाल हिरण्यकशिपुका हुआ ॥ १॥

नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी ॥ 
मन कपटी तन सज्जन चीन्हा । आपु सरिस सबही चह कीन्हा ॥ २ ॥

जो स्त्री-पुरुष नारदकी सीख सुनते हैं, वे घर-बार छोड़कर अवश्य ही भिखारी हो जाते हैं। उनका मन तो कपटी है, शरीरपर सज्जनोंके चिह्न हैं। वे सभीको अपने समान बनाना चाहते हैं ॥ २ ॥

तेहि कें बचन मानि बिस्वासा । तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा ॥ 
निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली ॥ ३ ॥

उनके वचनोंपर विश्वास मानकर तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभावसे ही उदासीन, गुणहीन, निर्लज्ज, बुरे वेषवाला, नर-कपालोंकी माला पहननेवाला, कुलहीन, बिना घर-बारका, नंगा और शरीरपर साँपोंको लपेटे रखनेवाला है ॥ ३ ॥

कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ ॥ 
पंच कहें सिवँ सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही ॥ ४ ॥

ऐसे वरके मिलनेसे कहो, तुम्हें क्या सुख होगा? तुम उस ठग (नारद) के बहकावेमें आकर खूब भूलीं। पहले पंचोंके कहनेसे शिवने सतीसे विवाह किया था, परन्तु फिर उसे त्यागकर मरवा डाला ॥ ४॥

दो०- अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं । 
सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं ॥ ७९ ॥

अब शिवको कोई चिन्ता नहीं रही, भीख माँगकर खा लेते हैं और सुखसे सोते हैं। ऐसे स्वभावसे ही अकेले रहनेवालोंके घर भी भला क्या कभी स्त्रियाँ टिक सकती हैं? ॥ ७९ ॥

अजहूँ मानहु कहा हमारा । हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा ॥ 
अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला । गावहिं बेद जासु जस लीला ॥ १ ॥

अब भी हमारा कहा मानो, हमने तुम्हारे लिये अच्छा वर विचारा है। वह बहुत ही सुन्दर, पवित्र, सुखदायक और सुशील है, जिसका यश और लीला वेद गाते हैं ॥ १ ॥

दूषन रहित सकल गुन रासी । श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी ॥ 
अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी । सुनत बिहसि कह बचन भवानी ॥ २ ॥

वह दोषोंसे रहित, सारे सदृणोंकी राशि, लक्ष्मीका स्वामी और वैकुण्ठपुरीका रहनेवाला है। हम ऐसे वरको लाकर तुमसे मिला देंगे। यह सुनते ही पार्वतीजी हँसकर बोलीं- ॥ २॥

सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा । हठ न छूट छूटै बरु देहा ॥ कनकउ पुनि पषान तें होई । जारेहुँ सहजु न परिहर सोई ॥ ३ ॥

आपने यह सत्य ही कहा कि मेरा यह शरीर पर्वतसे उत्पन्न हुआ है। इसलिये हठ नहीं छूटेगा, शरीर भले ही छूट जाय। सोना भी पत्थरसे ही उत्पन्न होता है, सो वह जलाये जानेपर भी अपने स्वभाव (सुवर्णत्व) को नहीं छोड़ता ॥ ३ ॥

नारद बचन न मैं परिहरऊँ । बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ ॥ 
गुर कें बचन प्रतीति न जेही । सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही ॥ ४ ॥

अतः मैं नारदजीके वचनोंको नहीं छोड़ेंगी; चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती। जिसको गुरुके वचनोंमें विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्नमें भी सुगम नहीं होती ॥ ४॥

दो० - महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम । 
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम ॥ ८० ॥

माना कि महादेवजी अवगुणोंके भवन हैं और विष्णु समस्त सगुणोंके धाम हैं; पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसको तो उसीसे काम है॥ ८०॥

जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा । सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा ॥ 
अब मैं जन्मु संभु हित हारा । को गुन दूषन करै बिचारा ॥ १ ॥

हे मुनीश्वरो ! यदि आप पहले मिलते, तो मैं आपका उपदेश सिर-माथे रखकर सुनती। परंतु अब तो मैं अपना जन्म शिवजीके लिये हार चुकी। फिर गुण-दोषोंका विचार कौन करे ? ॥ १॥

जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी । रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी ॥ 
तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं । बर कन्या अनेक जग माहीं ॥ २ ॥

यदि आपके हृदयमें बहुत ही हठ है और विवाहकी बातचीत (बरेखी) किये बिना आपसे रहा ही नहीं जाता, तो संसारमें वर-कन्या बहुत हैं। खिलवाड़ करनेवालोंको आलस्य तो होता नहीं [और कहीं जाकर कीजिये ] ॥ २ ॥

जन्म कोटि लगि रगर हमारी । बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी ॥ 
तजउँ न नारद कर उपदेसू । आपु कहहिं सत बार महेसू ॥ ३ ॥

मेरा तो करोड़ जन्मोंतक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजीको वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी सौ बार कहें, तो भी नारदजीके उपदेशको न छोड़ेंगी ॥ ३ ॥

मैं पा परउँ कहइ जगदंबा । तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा ॥ 
देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी । जय जय जगदंबिके भवानी ॥ ४ ॥

जगज्जननी पार्वतीजीने फिर कहा कि मैं आपके पैरों पड़ती हूँ। आप अपने घर जाइये, बहुत देर हो गयी। [शिवजीमें पार्वतीजीका ऐसा] प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले- हे जगज्जननी ! हे भवानी! आपकी जय हो! जय हो !!॥ ४ ॥

दो० - तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु । 
नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु ॥ ८१ ॥

आप माया हैं और शिवजी भगवान् हैं। आप दोनों समस्त जगत्के माता-पिता हैं। [यह कहकर] मुनि पार्वतीजीके चरणोंमें सिर नवाकर चल दिये। उनके शरीर बार-बार पुलकित हो रहे थे ॥ ८१ ॥

जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए । करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए ॥ 
बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई । कथा उमा कै सकल सुनाई ॥ १ ॥

मुनियोंने जाकर हिमवान्‌को पार्वतीजीके पास भेजा और वे विनती करके उनको घर ले आये; फिर सप्तर्षियोंने शिवजीके पास जाकर उनको पार्वतीजीकी सारी कथा सुनायी ॥ १ ॥

भए मगन सिव सुनत सनेहा । हरषि सप्तरिषि गवने गेहा ॥ 
मनु थिर करि तब संभु सुजाना । लगे करन रघुनायक ध्याना ।। २ ॥

पार्वतीजीका प्रेम सुनते ही शिवजी आनन्दमग्न हो गये। सप्तर्षि प्रसन्न होकर अपने घर (ब्रह्मलोक) को चले गये। तब सुजान शिवजी मनको स्थिर करके श्रीरघुनाथजीका ध्यान करने लगे ॥ २ ॥

तारकु असुर भयउ तेहि काला । भुज प्रताप बल तेज बिसाला ॥ 
तेहिं सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते ॥ ३ ॥

उसी समय तारक नामका असुर हुआ, जिसकी भुजाओंका बल, प्रताप और तेज बहुत बड़ा था। उसने सब लोक और लोकपालोंको जीत लिया, सब देवता सुख और सम्पत्तिसे रहित हो गये ॥ ३ ॥

अजर अमर सो जीति न जाई । हारे सुर करि बिबिध लराई ॥ 
तब बिरंचि सन जाइ पुकारे । देखे बिधि सब देव दुखारे ॥ ४ ॥

वह अजर-अमर था, इसलिये किसीसे जीता नहीं जाता था। देवता उसके साथ बहुत तरहकी लड़ाइयाँ लड़कर हार गये। तब उन्होंने ब्रह्माजीके पास जाकर पुकार मचायी। ब्रह्माजीने सब देवताओंको दुःखी देखा ॥ ४॥

दो० - सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ । 
संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ ॥ ८२ ॥

ब्रह्माजीने सबको समझाकर कहा- इस दैत्यकी मृत्यु तब होगी जब शिवजीके वीर्यसे पुत्र उत्पन्न हो, इसको युद्धमें वही जीतेगा ॥ ८२ ॥

मोर कहा सुनि करहु उपाई । होइहि ईस्वर करिहि सहाई ॥ सतीं जो तजी दच्छ मख देहा । जनमी जाइ हिमाचल गेहा ॥ १ ॥

मेरी बात सुनकर उपाय करो। ईश्वर सहायता करेंगे और काम हो जायगा। सतीजीने जो दक्षके यज्ञमें देहका त्याग किया था, उन्होंने अब हिमाचलके घर जाकर जन्म लिया है ॥ १ ॥

तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी ॥ 
जदपि अहइ असमंजस भारी । तदपि बात एक सुनहु हमारी ॥ २ ॥

उन्होंने शिवजीको पति बनानेके लिये तप किया है. इधर शिवजी सब छोड़-छाड़कर समाधि लगा बैठे हैं। यद्यपि है तो बड़े असमंजसकी बात; तथापि मेरी एक बात सुनो ॥ २ ॥

पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं । करै छोभु संकर मन माहीं ॥ 
तब हम जाइ सिवहि सिर नाई । करवाउब बिबाहु बरिआई ॥ ३ ॥

तुम जाकर कामदेवको शिवजीके पास भेजो, वह शिवजीके मनमें क्षोभ उत्पन्न करे (उनकी समाधि भङ्ग करे)। तब हम जाकर शिवजीके चरणोंमें सिर रख देंगे और जबरदस्ती (उन्हें राजी करके) विवाह करा देंगे ॥ ३ ॥

एहि बिधि भलेहिं देवहित होई । मत अति नीक कहइ सबु कोई ॥ 
अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू । प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू ॥ ४ ॥

इस प्रकारसे भले ही देवताओंका हित हो [और तो कोई उपाय नहीं है। सबने कहा-यह सम्मति बहुत अच्छी है। फिर देवताओंने बड़े प्रेमसे स्तुति की, तब विषम (पाँच) बाण धारण करनेवाला और मछलीके चिह्नयुक्त ध्वजावाला कामदेव प्रकट हुआ ॥ ४॥

दो० - सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार। 
संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार ॥ ८३ ॥

देवताओंने कामदेवसे अपनी सारी विपत्ति कही। सुनकर कामदेवने मनमें विचार किया और हँसकर देवताओंसे यों कहा कि शिवजीके साथ विरोध करनेमें मेरी कुशल नहीं है॥ ८३ ॥

तदपि करब मैं काजु तुम्हारा । श्रुति कह परम धरम उपकारा ॥ 
पर हित लागि तजइ जो देही । संतत संत प्रसंसहिं तेही ॥ १ ॥

तथापि मैं तुम्हारा काम तो करूँगा, क्योंकि वेद दूसरेके उपकारको परम धर्म कहते हैं। जो दूसरेके हितके लिये अपना शरीर त्याग देता है, संत सदा उसकी बड़ाई करते हैं ॥ १ ॥

अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई ॥ 
चलत मार अस हृदयँ बिचारा । सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा ॥ २ ॥

यों कह और सबको सिर नवाकर कामदेव अपने पुष्पके धनुषको हाथमें लेकर [वसन्तादि] सहायकोंके साथ चला। चलते समय कामदेवने हृदयमें ऐसा विचार किया कि शिवजीके साथ विरोध करनेसे मेरा मरण निश्चित है ॥ २॥

तब आपन प्रभाउ बिस्तारा । निज बस कीन्ह सकल संसारा ॥ 
कोपेउ जबहिं बारिचरकेतू । छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू ॥ ३ ॥

तब उसने अपना प्रभाव फैलाया और समस्त संसारको अपने वशमें कर लिया। जिस समय उस मछलीके चिह्नकी ध्वजावाले कामदेवने कोप किया, उस समय क्षणभरमें ही वेदोंकी सारी मर्यादा मिट गयी ॥ ३॥

ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना । धीरज धरम ग्यान बिग्याना ॥ सदाचार जप जोग बिरागा । सभय बिबेक कटक सब भागा ॥ ४ ॥

ब्रह्मचर्य, नियम, नाना प्रकारके संयम, धीरज, धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सदाचार, जप, योग, वैराग्य आदि विवेककी सारी सेना डरकर भाग गयी ॥ ४॥

छं०- भागेउ बिबेकु सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे। सदग्रंथ पर्बत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे ॥ 
होनिहार का करतार को रखवार जग खरभरु परा। 
दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपि कर धनु सरु धरा ।।

विवेक अपने सहायकोंसहित भाग गया, उसके योद्धा रणभूमिसे पीठ दिखा गये। उस समय वे सब सद्ग्रन्थरूपी पर्वतकी कन्दराओंमें जा छिपे (अर्थात् ज्ञान, वैराग्य, संयम, नियम, सदाचारादि ग्रन्थोंमें ही लिखे रह गये; उनका आचरण छूट गया)। सारे जगत्‌में खलबली मच गयी [और सब कहने लगे हे विधाता ! अब क्या होनेवाला है, हमारी रक्षा कौन करेगा ? ऐसा दो सिरवाला कौन है, जिसके लिये रतिके पति कामदेवने कोप करके हाथमें धनुष-बाण उठाया है?

दो० - जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम। 
ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम ॥ ८४ ॥

जगत्में स्त्री-पुरुष संज्ञावाले जितने चर-अचर प्राणी थे, वे सब अपनी-अपनी मर्यादा छोड़कर कामके वश हो गये ॥ ८४ ॥

सब के हृदय मदन अभिलाषा । लता निहारि नवहिं तरु साखा ॥ 
नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाईं। संगम करहिं तलाव तलाईं ॥ १ ॥

सबके हृदयमें कामकी इच्छा हो गयी। लताओं (बेलों) को देखकर वृक्षोंकी डालियाँ झुकने लगीं। नदियाँ उमड़ उमड़कर समुद्रकी ओर दौड़ीं और ताल तलैयाँ भी आपसमें संगम करने (मिलने-जुलने) लगीं ॥ १ ॥

जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी ॥ 
पसु पच्छी नभ जल थल चारी । भए कामबस समय बिसारी ॥ २ ॥

जब जड (वृक्ष, नदी आदि) की यह दशा कही गयी, तब चेतन जीवोंकी करनी कौन कह सकता है? आकाश, जल और पृथ्वीपर विचरनेवाले सारे पशु-पक्षी [अपने संयोगका] समय भुलाकर कामके वश हो गये ॥ २ ॥

मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिन नहिं अवलोकहिं कोका ॥ 
देव दनुज नर किंनर ब्याला । प्रेत पिसाच भूत बेताला ॥ ३ ॥

सब लोग कामान्ध होकर व्याकुल हो गये। चकवा-चकवी रात-दिन नहीं देखते । देव, दैत्य, मनुष्य, किन्नर, सर्प, प्रेत, पिशाच, भूत, बेताल ॥३॥

इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी । सदा काम के चेरे जानी ॥ 
सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी । तेपि कामबस भए बियोगी ॥ ४ ॥

ये तो सदा ही कामके गुलाम हैं, यह समझकर मैंने इनकी दशाका वर्णन नहीं किया। सिद्ध, विरक्त, महामुनि और महान् योगी भी कामके वश होकर योगरहित या स्त्रीके विरही हो गये ॥ ४॥

छं०- भए कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै। देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे ॥ 
अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं । 
दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं ॥

जब योगीश्वर और तपस्वी भी कामके वश हो गये, तब पामर मनुष्योंकी कौन कहे ? जो समस्त चराचर जगत्को ब्रह्ममय देखते थे, वे अब उसे स्त्रीमय देखने लगे। स्त्रियाँ सारे संसारको पुरुषमय देखने लगीं और पुरुष उसे स्त्रीमय देखने लगे। दो घड़ीतक सारे ब्रह्माण्डके अंदर कामदेवका रचा हुआ यह कौतुक (तमाशा) रहा।

सो०-धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे। 
जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ ॥ ८५ ॥

किसीने भी हृदयमें धैर्य नहीं धारण किया, कामदेवने सबके मन हर लिये। श्रीरघुनाथजीने जिनकी रक्षा की, केवल वे ही उस समय बचे रहे ॥ ८५ ॥

उभय घरी अस कौतुक भयऊ । जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ ॥ 
सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू । भयउ जथाथिति सबु संसारू ॥ १ ॥

दो घड़ीतक ऐसा तमाशा हुआ, जबतक कामदेव शिवजीके पास पहुँच गया। शिवजीको देखकर कामदेव डर गया, तब सारा संसार फिर जैसा-का-तैसा स्थिर हो गया ॥ १ ॥

भए तुरत सब जीव सुखारे । जिमि मद उतरि गएँ मतवारे ॥ रुद्रहि देखि मदन भय माना । दुराधरष दुर्गम भगवाना ॥  २ ॥

तुरंत ही सब जीव वैसे ही सुखी हो गये जैसे मतवाले (नशा पिये हुए) लोग मद (नशा) उतर जानेपर सुखी होते हैं। दुराधर्ष (जिनको पराजित करना अत्यन्त ही कठिन है) और दुर्गम (जिनका पार पाना कठिन है) भगवान् (सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्यरूप छः ईश्वरीय गुणोंसे युक्त) रुद्र (महाभयङ्कर) शिवजीको देखकर कामदेव भयभीत हो गया ॥ २ ॥

फिरत लाज कछु करि नहिं जाई । मरनु ठानि मन रचेसि उपाई ॥ प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा । कुसुमित नव तरु राजि बिराजा ॥

लौट जानेमें लज्जा मालूम होती है और करते कुछ बनता नहीं। आखिर मनमें मरनेका निश्चय करके उसने उपाय रचा। तुरंत ही सुन्दर ऋतुराज वसन्तको प्रकट किया। फूले हुए नये-नये वृक्षोंकी कतारें सुशोभित हो गयीं ॥ ३ ॥

बन उपबन बापिका तड़ागा । परम सुभग सब दिसा बिभागा ॥ जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा । देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा ॥

वन-उपवन, बावली-तालाब और सब दिशाओंके विभाग परम सुन्दर हो गये। जहाँ-तहाँ मानो प्रेम उमड़ रहा है, जिसे देखकर मरे मनोंमें भी कामदेव जाग उठा ॥ ४॥

छं०-जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही। सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही ॥ बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा। कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा ॥

मरे हुए मनमें भी कामदेव जागने लगा, वनकी सुन्दरता कही नहीं जा सकती। कामरूपी अग्निका सच्चा मित्र शीतल-मन्द-सुगन्धित पवन चलने लगा। सरोवरोंमें अनेकों कमल खिल गये, जिनपर सुन्दर भौंरोंके समूह गुंजार करने लगे। राजहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे और अप्सराएँ गा-गाकर नाचने लगीं।

दो०- सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत । 
चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत ॥ ८६ ॥

कामदेव अपनी सेनासमेत करोड़ों प्रकारकी सब कलाएँ (उपाय) करके हार गया, पर शिवजीकी अचल समाधि न डिगी। तब कामदेव क्रोधित हो उठा ॥ ८६ ॥

देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा ॥ सुमन चाप निज सर संधाने । अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने ॥

तुरंत ही सब जीव वैसे ही सुखी हो गये जैसे मतवाले (नशा पिये हुए) लोग मद (नशा) उतर जानेपर सुखी होते हैं। दुराधर्ष (जिनको पराजित करना अत्यन्त ही कठिन है) और दुर्गम (जिनका पार पाना कठिन है) भगवान् (सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्यरूप छः ईश्वरीय गुणोंसे युक्त) रुद्र (महाभयङ्कर) शिवजीको देखकर कामदेव भयभीत हो गया ॥ २॥

फिरत लाज कछु करि नहिं जाई । मरनु ठानि मन रचेसि उपाई ॥ प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा । कुसुमित नव तरु राजि बिराजा ॥

लौट जानेमें लज्जा मालूम होती है और करते कुछ बनता नहीं। आखिर मनमें मरनेका निश्चय करके उसने उपाय रचा। तुरंत ही सुन्दर ऋतुराज वसन्तको प्रकट किया। फूले हुए नये-नये वृक्षोंकी कतारें सुशोभित हो गयीं ॥ ३ ॥

बन उपबन बापिका तड़ागा । परम सुभग सब दिसा बिभागा ॥ जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा ॥

वन-उपवन, बावली-तालाब और सब दिशाओंके विभाग परम सुन्दर हो गये। जहाँ-तहाँ मानो प्रेम उमड़ रहा है, जिसे देखकर मरे मनोंमें भी कामदेव जाग उठा ॥ ४॥

छं० -जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही।
सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही ॥ बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा। कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा ।।

मरे हुए मनमें भी कामदेव जागने लगा, वनकी सुन्दरता कही नहीं जा सकती। कामरूपी अग्निका सच्चा मित्र शीतल-मन्द सुगन्धित पवन चलने लगा। सरोवरोंमें अनेकों कमल खिल गये, जिनपर सुन्दर भौंरोंके समूह गुंजार करने लगे। राजहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे और अप्सराएँ गा-गाकर नाचने लगीं।

दो०- सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत । चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत ॥ ८६ ॥

कामदेव अपनी सेनासमेत करोड़ों प्रकारकी सब कलाएँ (उपाय) करके हार गया, पर शिवजीकी अचल समाधि न डिगी। तब कामदेव क्रोधित हो उठा ॥ ८६ ॥

देखि रसाल बिटप बर साखा । तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा ॥ सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने ॥

आमके वृक्षकी एक सुन्दर डाली देखकर मनमें क्रोधसे भरा हुआ कामदेव उसपर चढ़ गया। उसने पुष्प-धनुषपर अपने [पाँचों] बाण चढाये और अत्यन्त क्रोधसे [लक्ष्यकी ओर] ताकका उन्हें कानतक तान लिया ॥ १ ॥

छाड़े बिषम बिसिख उर लागे । छूटि समाधि संभु तब जागे॥ भयउ ईस मन छोभ बिसेषी । नयन उघारि सकल दिसि देखी ॥

कामदेवने तीक्ष्ण पाँच बाण छोड़े, जो शिवजीके हृदयमें लगे। तब उनकी समाधि टूट गयी और वे जाग गये। ईश्वर (शिवजी के मनमें बहुत क्षोभ हुआ। उन्होंने आँखें खोलकर सब ओर देखा ॥ २ ॥

सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोप कंपेउ त्रैलोका ॥ तब सिवँ तीसर नयन उघारा । चितवत कामु भयउ जरि छारा ॥

जब आमके पत्तोंमें [छिपे हुए] कामदेवको देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध हुआ, जिससे तीनों लोक काँप उठे। तब शिवजीने तीसरा नेत्र खोला, उनके देखते ही कामदेव जलकर भस्म हो गया ॥ ३॥

हाहाकार भयउ जग भारी । डरपे सुर भए असुर सुखारी ॥ समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी । भए अकंटक साधक जोगी ॥

जगत्में बड़ा हाहाकार मच गया। देवता डर गये, दैत्य सुखी हुए। भोगी लोग कामसुखको याद करके चिन्ता करने लगे और साधक योगी निष्कंटक हो गये ॥ ४॥

छं० - जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई। रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई।

अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही। प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही ॥

योगी निष्कंटक हो गये, कामदेवकी स्त्री रति अपने पतिकी यह दशा सुनते ही मूच्छित हो गयी। रोती-चिल्लाती और भाँति-भाँतिसे करुणा करती हुई वह शिवजीके पास गयी। अत्यन्त प्रेमके साथ अनेकों प्रकारसे विनती करके हाथ जोड़कर सामने खड़ी हो गयी। शीघ्र प्रसन्न होनेवाले कृपालु शिवजी अबला (असहाया स्त्री) को देखकर सुन्दर (उसको सान्त्वना देनेवाले) वचन बोले-

दो० - अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु।
बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु ॥ ८७ ॥

 हे रति ! अबसे तेरे स्वामीका नाम अनङ्ग होगा। वह बिना ही शरीरके सबको व्यापेगा। अब तू अपने पतिसे मिलनेकी बात सुन ॥ ८७॥

जब जदुबंस कृष्न अवतारा । होइहि हरन महा महिभारा ॥ कृष्न तनय होइहि पति तोरा । बचनु अन्यथा होइ न मोरा ॥

जब पृथ्वीके बड़े भारी भारको उतारनेके लिये यदुवंशमें श्रीकृष्णका अवतार होगा, तब तेरा पति उनके पुत्र (प्रद्युम्न) के रूपमें उत्पन्न होगा। मेरा यह वचन अन्यथा नहीं होगा ॥ १॥

रति गवनी सुनि संकर बानी । कथा अपर अब कहउँ बखानी ॥ देवन्ह समाचार सब पाए । ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए ॥

शिवजीके वचन सुनकर रति चली गयी। अब दूसरी कथा बखानकर (विस्तारसे) कहता हूँ। ब्रह्मादि देवताओंने ये सब समाचार सुने तो वे वैकुण्ठको चले ॥ २॥

सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता । गए पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा । भए जहाँ सिव कृपानिकेता ॥ प्रसन्न चंद्र अवतंसा ॥

फिर वहाँसे विष्णु और ब्रह्मासहित सब देवता वहाँ गये जहाँ कृपाके धाम शिवजी थे। उन सबने शिवजीकी अलग-अलग स्तुति की, तब शशिभूषण शिवजी प्रसन्न हो गये ॥ ३ ॥

बोले कृपासिंधु बृषकेतू । कहहु अमर आए केहि हेतू ॥ कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी । तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी ॥

कृपाके समुद्र शिवजी बोले- हे देवताओ! कहिये, आप किसलिये आये हैं? ब्रह्माजीने कहा-हे प्रभो! आप अन्तर्यामी हैं, तथापि हे स्वामी! भक्तिवश मैं आपसे विनती करता हूँ ॥ ४॥

दो०- सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु । निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु ॥ ८८ ॥

हे शङ्कर ! सब देवताओंके मनमें ऐसा परम उत्साह है कि हे नाथ! वे अपनी आँखोंसे आपका विवाह देखना चाहते हैं ॥ ८८ ॥

यह उत्सव देखिअ भरि लोचन । सोइ कछु करहु मदन मद मोचन ॥ कामु जारि रति कहुँ बरु दीन्हा । कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा ॥

हे कामदेवके मदको चूर करनेवाले! आप ऐसा कुछ कीजिये जिससे सब लोग इस उत्सवको नेत्र भरकर देखें। हे कृपाके सागर! कामदेवको भस्म करके आपने रतिको जो वरदान दिया सो बहुत ही अच्छा किया ॥ १ ॥

सासति करि पुनि करहिं पसाऊ । नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ ॥ पारबतीं तपु कीन्ह अपारा । करहु तासु अब अंगीकारा ॥

हे नाथ! श्रेष्ठ स्वामियोंका यह सहज स्वभाव ही है कि वे पहले दण्ड देकर फिर कृपा किया करते हैं। पार्वतीने अपार तप किया है, अब उन्हें अङ्गीकार कीजिये ॥ २ ॥

सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी ॥ तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं । बरषि सुमन जय जय सुर साईं ॥

ब्रह्माजीकी प्रार्थना सुनकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वचनोंको याद करके शिवजीने प्रसन्नतापूर्वक कहा-'ऐसा ही हो।' तब देवताओंने नगाड़े बजाये और फूलोंकी वर्षा करके 'जय हो ! देवताओंके स्वामीकी जय हो!' ऐसा कहने लगे ॥ ३॥

अवसरु जानि सप्तरिषि आए । तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए॥ प्रथम गए जहँ रहीं भवानी । बोले मधुर बचन छल सानी ॥

उचित अवसर जानकर सप्तर्षि आये और ब्रह्माजीने तुरंत ही उन्हें हिमाचलके घर भेज दिया। वे पहले वहाँ गये जहाँ पार्वतीजी थीं और उनसे छलसे भरे मीठे (विनोदयुक्त, आनन्द पहुँचानेवाले) वचन बोले- ॥ ४ ॥

दो०- कहा हमार न सुनेहु तब नारद के उपदेस। अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस ॥ ८९ ॥

नारदजीके उपदेशसे तुमने उस समय हमारी बात नहीं सुनी। अब तो तुम्हारा प्रण झूठा हो गया, क्योंकि महादेवजीने कामको ही भस्म कर डाला ॥ ८९ ॥

मासपारायण, तीसरा विश्राम

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