001. भरद्वाजजी द्वारा याज्ञवल्क्य मुनि को अपने आश्रम में रोककर उनसे श्रीराम कथा कहने का आग्रह
बालकाण्ड
001. भरद्वाजजी द्वारा याज्ञवल्क्य मुनि को अपने आश्रम में रोककर उनसे श्रीराम कथा कहने का आग्रह
तुलसी दास जी कहते हैं कि
मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि मन अन्हवाइ । सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ ।। ४३ (क) ॥
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद । कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद ॥ ४३ (ख) ॥
अपनी बुद्धिके अनुसार इस सुन्दर जलके गुणोंको विचारकर, उसमें अपने मनको स्नान कराकर और श्रीभवानी-शङ्करको स्मरण करके कवि (तुलसीदास) सुन्दर कथा कहता है॥ ४३ (क) ॥
मैं अब श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंको हृदयमें धारणकर और उनका प्रसाद पाकर दोनों श्रेष्ठ मुनियोंके मिलनका सुन्दर संवाद वर्णन करता हूँ ॥ ४३ (ख) ॥
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा । तिन्हहि राम पद अति अनुरागा ॥ तापस सम दम दया निधाना । परमारथ पथ परम सुजाना ॥ १॥
माघ मकरगत रबि जब होई । तीरथपतिहिं आव सब कोई॥ देव दनुज किंनर नर श्रेनीं । सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं ॥ २॥
पूजहिं माधव पद जलजाता । परसि अखय बटु हरषहिं गाता॥ भरद्वाज आश्रम अति पावन । परम रम्य मुनिबर मन भावन ॥ ३॥
तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा ॥ मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा ।। ४॥
भरद्वाज मुनि, तीर्थराज प्रयागमें (अपने आश्रम में) बसते हैं, उनका श्रीरामजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम है। वे तपस्वी, निगृहीतचित्त, जितेन्द्रिय, दयाके निधान और परमार्थके मार्गमें बड़े ही चतुर हैं ॥ १॥
माघ मास में जब सूर्यदेव मकर राशिपर जाते हैं तब सब लोग तीर्थराज प्रयागको आते हैं। देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्योंके समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणीमें स्नान करते हैं॥ २॥
श्रीवेणीमाधवजीके चरणकमलोंको पूजते हैं और अक्षयवटका स्पर्शकर उनके शरीर पुलकित होते हैं। भरद्वाजजीका आश्रम बहुत ही पवित्र, परम रमणीय और श्रेष्ठ मुनियोंके मनको भानेवाला है॥ ३॥
(इस कारण) तीर्थराज प्रयागमें जो स्नान करने जाते हैं उन ऋषि-मुनियोंका समाज वहाँ (भरद्वाजके आश्रममें) जुटता है। प्रातःकाल सब उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और फिर परस्पर भगवान्के गुणोंकी कथाएँ कहते हैं॥ ४॥
दो०- ब्रह्म निरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग। कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग ॥ ४४ ॥
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं ।। प्रति संबत अति होइ अनंदा । मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा ॥ १ ॥
एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए । जागबलिक मुनि परम बिबेकी । भरद्वाज राखे पद टेकी ॥ २ ॥
सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे ॥ करि पूजा मुनि सुजसु बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी ॥ ३ ॥
नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्त्व सबु तोरें ॥ कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा ॥ ४ ॥
(वे आपस में) ब्रह्मका निरूपण, धर्मका विधान और तत्त्वोंके विभागका वर्णन करते हैं तथा ज्ञान-वैराग्यसे युक्त भगवान्की भक्तिका कथन करते हैं ॥ ४४ ॥
इसी प्रकार (सभी संतजन) माघके महीनेभर स्नान करते हैं और फिर सब अपने-अपने आश्रमोंको चले जाते हैं। हर साल वहाँ इसी तरह बड़ा आनन्द होता है। मकरमें स्नान करके मुनिगण चले जाते हैं ॥ १ ॥
एक बार पूरे मकरभर स्नान करके सब मुनीश्वर अपने-अपने आश्रमोंको लौटने लगे। तब परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य मुनिको चरण पकड़कर भरद्वाजजीने रख लिया अर्थात रोक लिया॥ २ ॥
(भरद्वाजजीने) आदरपूर्वक उनके चरणकमल धोये और बड़े ही पवित्र आसनपर उन्हें बैठाया। पूजा करके मुनि याज्ञवल्क्यजी के सुयशका वर्णन किया और फिर अत्यन्त पवित्र और कोमल वाणीसे बोले - ॥ ३ ॥
"हे नाथ ! मेरे मनमें एक बड़ा सन्देह है; वेदोंका तत्त्व सब आपकी मुट्ठीमें है (अर्थात् आप ही वेदका तत्त्व जाननेवाले होनेके कारण मेरा सन्देह निवारण कर सकते हैं) पर उस सन्देहको कहते मुझे भय और लाज आती है [भय इसलिये कि कहीं आप यह न समझें कि मेरी परीक्षा ले रहा है, लाज इसलिये कि इतनी आयु बीत गयी, अबतक ज्ञान न हुआ और यदि नहीं कहता तो बड़ी हानि होती है [क्योंकि अज्ञानी बना रहता हूँ] ॥४॥
दो०- संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव। होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किए दुराव ॥ ४५॥
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोह। हरहु नाथ करि जन पर छोह ॥ राम नाम कर अमित प्रभावा । संत पुरान उपनिषद गावा ॥ १ ॥
संतत जपत संभु अबिनासी । सिव भगवान ग्यान गुन रासी ॥ आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥ २ ॥
सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया ॥ रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही । कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही ॥ ३ ॥
एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा ॥ नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयउ रोषु रन रावनु मारा ॥ ४ ॥
हे प्रभो ! संतलोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरुके साथ छिपाव करनेसे हृदयमें निर्मल ज्ञान नहीं होता ॥ ४५ ॥
यही सोचकर मैं अपना अज्ञान प्रकट करता हूँ। हे नाथ ! सेवकपर कृपा करके इस अज्ञानका नाश कीजिये। संतों, पुराणों और उपनिषदोंने रामनामके असीम प्रभावका गान किया है ॥ १॥
कल्याणस्वरूप, ज्ञान और गुणोंकी राशि, अविनाशी भगवान् शम्भु निरन्तर रामनामका जप करते रहते हैं। संसारमें चार जाति (अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्ज) के जीव हैं, काशीमें मरनेसे सभी परमपदको प्राप्त करते हैं ॥ २ ॥
{ यहाँ “चार जातियाँ” सामाजिक वर्ण (ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि) नहीं हैं, बल्कि जीवों की उत्पत्ति के चार प्रकार हैं, जिन्हें शास्त्रों में चतुर्विध योनियाँ कहा गया है। संसार की चार जातियाँ (चतुर्विध योनियाँ) शास्त्रों (गरुड़ पुराण, भागवत, मनुस्मृति) के अनुसार संसार में सभी जीव चार प्रकार से उत्पन्न होते हैं—अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्ज
1️⃣ अण्डज –> अंडे से उत्पन्न होने वाले जीव
उदाहरण: –> पक्षी (चिड़िया, कौआ, हंस), सरीसर्प, मछली, कछुआ आदि 👉 ये सभी अंडे से जन्म लेते हैं।
2️⃣ जरायुज –> जरायु अर्थात गर्भनाल (प्लेसेंटा) से उत्पन्न जीव
उदाहरण: –> मनुष्य, गाय, घोड़ा, हाथी, सिंह, कुत्ता, बिल्ली 👉 स्तनधारी जीव इसी श्रेणी में आते हैं।
3️⃣ स्वेदज –> पसीने, गंदगी या नमी से उत्पन्न जीव
उदाहरण: –> जूँ, खटमल, कीड़े-मकोड़े, कुछ सूक्ष्म जीव
👉 ये नमी या मल-कचरे से उत्पन्न माने गए हैं।
4️⃣ उद्भिज्ज –> भूमि को फोड़कर उत्पन्न होने वाले जीव
उदाहरण: –> वृक्ष, लताएँ, घास, पौधे
👉 बीज से या धरती को चीरकर उत्पन्न होने वाले सभी वनस्पति-जीव।
यहां दोहे का भावार्थ (गूढ़ अर्थ) इस प्रकार से है –>
इस चौपाई का आशय यह है कि— काशी भगवान शिव की नगरी है भगवान शम्भु (शिव) स्वयं रामनाम का जप करते हैं। इसलिए काशी में देह त्याग करने वाला कोई भी जीव, चाहे वह मनुष्य हो, पशु हो, पक्षी हो, कीट हो या वनस्पति ही क्यों न हो, वह शिव-कृपा से परम गति (मोक्ष) प्राप्त करता है, इसीलिए कहा गया है कि काशी में मरना “महामोक्ष” का द्वार है। }
हे मुनिराज ! वह भी राम [नाम] की ही महिमा है, क्योंकि शिवजी महाराज दया करके [काशीमें मरनेवाले जीवको रामनामका ही उपदेश करते हैं [इसीसे उनको परमपद मिलता है]। हे प्रभो ! मैं आपसे पूछता हूँ कि वे राम कौन हैं ? हे कृपानिधान ! मुझे समझाकर कहिये ॥ ३ ॥
एक राम तो अवधनरेश दशरथजीके कुमार हैं, उनका चरित्र सारा संसार जानता है। उन्होंने स्त्रीके विरहमें अपार दुःख उठाया और क्रोध आनेपर युद्धमें रावणको मार डाला ॥ ४॥
दो०- प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि। सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि ॥ ४६ ॥
जैसें मिटै मोर भ्रम भारी । कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी ॥ जागबलिक बोले मुसुकाई । तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई ॥ १॥
रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारि मैं जानी ॥ चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा ॥ २॥
तात सुनहु सादर मनु लाई । कहउँ राम कै कथा सुहाई ॥ महामोहु महिषेसु बिसाला । रामकथा कालिका कराला ॥ ३॥
रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना ॥ ऐसेड़ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी ॥ ४॥
हे प्रभो ! वही राम हैं या और कोई दूसरे हैं, जिनको शिवजी जपते हैं? आप सत्यके धाम हैं और सब कुछ जानते हैं, ज्ञान विचारकर कहिये ॥ ४६ ॥
हे नाथ! जिस प्रकारसे मेरा यह भारी भ्रम मिट जाय, आप वही कथा विस्तारपूर्वक कहिये। इसपर याज्ञवल्क्यजी मुसकराकर बोले, श्रीरघुनाथजीकी प्रभुताको तुम जानते हो ॥ १॥
श्रीरामजीके तुम मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके भक्त हो। तुम्हारी चतुराईको मैं जान गया। तुम रहस्यमय गुणोंको सुनना चाहते हो; इसीसे तुमने ऐसा प्रश्न किया है मानो बड़े ही मूढ़ हो ॥ २ ॥
हे तात! तुम आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो; मैं श्रीरामजीकी सुन्दर कथा कहता हूँ। बड़ा भारी अज्ञान विशाल महिषासुर है और श्रीरामजीकी कथा [उसे नष्ट कर देनेवाली] भयंकर कालीजी हैं ॥ ३ ॥
श्रीरामजीकी कथा चन्द्रमाकी किरणोंके समान है, जिसे संतरूपी चकोर सदा पान करते हैं। ऐसा ही सन्देह पार्वतीजीने किया था, तब महादेवजीने विस्तारसे उसका उत्तर दिया था ॥ ४॥
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